यूरोप की सबसे बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनी फॉक्सवैगन ग्रुप बड़े स्तर पर लागत कम करने की योजना बना रहा है। रिपोर्टों के अनुसार, कंपनी करीब एक लाख कर्मचारियों की छंटनी पर विचार कर रही है। यह प्रस्ताव समूह के सीईओ ओलिवर ब्लूम की रणनीति का हिस्सा बताया जा रहा है, जिसका उद्देश्य कंपनी को ज्यादा प्रतिस्पर्धी और लाभदायक बनाना है। फिलहाल समूह में लगभग 6.57 लाख कर्मचारी काम करते हैं।
चार प्लांट बंद करने की योजना
रिपोर्ट के मुताबिक, कंपनी इस दशक के अंत तक करीब 11 अरब यूरो की लागत घटाना चाहती है। इसी योजना के तहत जर्मनी में चार मैन्युफैक्चरिंग प्लांट बंद करने का प्रस्ताव भी तैयार किया गया है। इनमें ऑडी का नेकरसुलम प्लांट और फॉक्सवैगन के हनोवर, ज़्विकाऊ और एम्डेन स्थित प्लांट शामिल बताए जा रहे हैं। अंतिम फैसला बोर्ड की मंजूरी के बाद ही होगा।
क्यों बढ़ा आर्थिक दबाव?
फॉक्सवैगन को कई मोर्चों पर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। अमेरिकी टैरिफ, चीन में कमजोर बिक्री, यूरोप में इलेक्ट्रिक वाहन कंपनियों की बढ़ती प्रतिस्पर्धा और कम मुनाफे ने कंपनी पर दबाव बढ़ाया है। इसके अलावा कंपनी अपने विभिन्न कारोबारों के पुनर्गठन और कुछ इकाइयों को अलग करने के विकल्प पर भी विचार कर रही है।
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पहले भी उठाए जा चुके हैं कदम
वित्तीय स्थिति सुधारने के लिए कंपनी पहले ही कई फैसले ले चुकी है। अपनी समुद्री इंजन इकाई में 51 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचकर नकदी जुटाई गई है। करीब 28 हजार कर्मचारी स्वैच्छिक रूप से कंपनी छोड़ने पर सहमत हो चुके हैं। साथ ही उत्पादन क्षमता को सालाना 1.2 करोड़ वाहनों से घटाकर 90 लाख वाहन करने की दिशा में भी काम चल रहा है।
यूनियनों का कड़ा विरोध
हालांकि कंपनी के इस प्रस्ताव का श्रमिक संगठनों ने विरोध शुरू कर दिया है। कर्मचारी परिषद और आईजी मेटाल यूनियन ने कहा है कि इतनी बड़ी छंटनी और प्लांट बंद करने की योजना कर्मचारियों और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर डालेगी। फॉक्सवैगन के बोर्ड में श्रमिक प्रतिनिधियों की मजबूत हिस्सेदारी होने के कारण इस प्रस्ताव को मंजूरी मिलना आसान नहीं माना जा रहा है।