Entertainment News : संतोषी माता को लेकर यह दावा अक्सर सुनने को मिलता है कि उन्हें फिल्म निर्देशक ने ही बनाया था। लेकिन इतिहास इससे थोड़ा अलग है. उपलब्ध शोध के अनुसार, संतोषी माता की पूजा उत्तर भारत के कुछ शहरों में 1960 के दशक में ही शुरू हो चुकी थी। उस समय यह परंपरा सीमित स्तर पर थी और देवी की पहचान पोस्टर, व्रत-कथाओं और मौखिक परंपराओं के जरिए फैल रही थी.
1975 में आई ‘जय संतोषी माँ’
30 मई 1975 को विजय शर्मा के निर्देशन में बनी हिंदी फिल्म जय संतोषी माँ रिलीज हुई। फिल्म में कानन कौशल, भारत भूषण, आशीष कुमार और अनीता गुहा जैसे कलाकार थे. कम बजट में बनी इस फिल्म ने उम्मीद से कहीं ज्यादा सफलता हासिल की और संतोषी माता को देशभर में लोकप्रिय बनाने में बड़ी भूमिका निभाई.
उसी साल ‘शोले’ भी आई थी
दिलचस्प बात यह है कि 1975 भारतीय सिनेमा के लिए ऐतिहासिक साल था। इसी साल 15 अगस्त को रमेश सिप्पी की शोले रिलीज हुई. जय संतोषी माँ ने अपनी कम लागत के बावजूद बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त प्रदर्शन किया और कई रिपोर्टों में इसे शोले के साथ उस साल की बड़ी सफल फिल्मों में गिना गया है.
16 शुक्रवार के व्रत का क्या सच है?
संतोषी माता से जुड़ी परंपरा में लगातार 16 शुक्रवार व्रत रखने की मान्यता है। व्रत में गुड़ और चने का प्रसाद चढ़ाने तथा खट्टी चीजों से परहेज करने की परंपरा बताई जाती है। फिल्म की कहानी ने इन मान्यताओं को बड़े पैमाने पर लोगों तक पहुंचाया और उनके धार्मिक पालन को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
फिल्म के बाद तेजी से बदली तस्वीर
जय संतोषी माँ की सफलता के बाद सिनेमाघरों में लोग फिल्म को सिर्फ मनोरंजन की तरह नहीं, बल्कि धार्मिक अनुभव की तरह देखने लगे। कई जगह दर्शक पूजा-पाठ करते और देवी को चढ़ावा चढ़ाते थे. फिल्म के बाद संतोषी माता के छोटे मंदिर और श्रद्धास्थल भी तेजी से दिखाई देने लगे। इसीलिए कुछ विद्वानों ने उन्हें लोकप्रिय संस्कृति की एक तरह की “celluloid goddess” यानी फिल्म के जरिए तेजी से लोकप्रिय हुई देवी के रूप में देखा है.
इसलिए पूरी कहानी यह नहीं है कि “एक निर्देशक ने संतोषी माता को बनाया और लोगों ने उनकी पूजा शुरू कर दी.” ज्यादा सटीक बात यह है कि संतोषी माता की पूजा और व्रत की परंपरा फिल्म से पहले मौजूद थी, लेकिन 1975 की जय संतोषी माँ ने उसे अभूतपूर्व लोकप्रियता दी। फिल्म ने 16 शुक्रवार के व्रत, गुड़-चना और खट्टी चीजों से परहेज जैसी मान्यताओं को लाखों लोगों तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई.