CJI Surya Kants big message: भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने न्याय व्यवस्था को एक जीवंत संस्था बताते हुए कहा है कि इसे निरंतरता और परिवर्तन के बीच संतुलन बनाकर चलना चाहिए। गोवा में आयोजित दो दिवसीय SCAORA अंतर्राष्ट्रीय विधि सम्मेलन के समापन सत्र में उन्होंने स्पष्ट किया कि कानून न तो बदलाव से डर सकता है और न ही बिना विवेक के हर नई प्रवृत्ति को अपना सकता है।
न्याय कोई संग्रहालय की वस्तु नहीं
CJI सूर्यकांत ने कहा कि न्याय कोई स्थिर या जमी हुई व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह समय के साथ परखी जाने वाली संस्था है। यदि कानून परिवर्तन से खुद को अलग कर लेता है, तो वह अप्रासंगिक हो जाता है। वहीं यदि वह बिना सोच-विचार के हर नवीनता को अपनाता है, तो अपने नैतिक मूल्यों को खोने का खतरा पैदा हो जाता है।
हम स्वामी नहीं
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि आज जो अदालतें, प्रक्रियाएं और सिद्धांत मौजूद हैं, उन्हें वर्तमान पीढ़ी ने नहीं बनाया है। ये सदियों के संघर्ष, बहस और नैतिक साहस की देन हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि न्याय व्यवस्था हमें अधिकार जरूर देती है, लेकिन उससे कहीं ज्यादा जिम्मेदारियां भी सौंपती है। इसी कारण हम इसके मालिक नहीं, बल्कि अस्थायी संरक्षक हैं।
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तकनीक और वैश्वीकरण से बढ़ी चुनौतियां
CJI ने कहा कि आज न्याय प्रणाली पर कई नए दबाव हैं। अदालतों से अपेक्षा की जाती है कि वे तेज भी हों और सावधान भी, सुलभ भी हों और संयमित भी। तकनीक कार्यकुशलता लाती है, लेकिन साथ ही निष्पक्षता से जुड़े नए जोखिम भी खड़े करती है। वैश्वीकरण ज्ञान बढ़ाता है, पर स्थानीय परिस्थितियों की संवेदनशीलता भी उतनी ही जरूरी है।
दबाव से बचना नहीं
उन्होंने कहा कि ये चुनौतियां न्याय व्यवस्था के लिए खतरा नहीं, बल्कि उसकी मजबूती की परीक्षा हैं। एक सशक्त और जीवंत संस्था वही होती है जो दबाव से भागने के बजाय, अपने मूल स्वरूप को बनाए रखते हुए उसे आत्मसात कर ले। यही संतुलन न्याय को समय के साथ प्रासंगिक बनाए रखता है।