
दिल्ली‑NCR में आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या अब एक गंभीर शहरी चुनौती बन चुकी है। सड़कों पर घूमते इन कुत्तों से दुर्घटनाएं, काटने की घटनाएं और जनसुरक्षा संबंधी चिंताएं लगातार बढ़ रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में इसके समाधान के लिए स्थानीय प्रशासन को आदेश दिया कि ऐसे कुत्तों को पकड़कर सुरक्षित शेल्टर में रखा जाए। लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत का मानना है कि यह कदम समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता।
"जनसंख्या नियंत्रण है असली उपाय"
मोहन भागवत ने साफ कहा कि आवारा कुत्तों की समस्या का हल केवल शेल्टर में बंद करने से नहीं, बल्कि उनकी जनसंख्या को नियंत्रित करने से संभव है। उनके अनुसार, जैसे मनुष्यों में परिवार नियोजन होता है, वैसे ही जानवरों के लिए भी प्राकृतिक और मानवीय तरीके से नसबंदी और प्रजनन नियंत्रण की आवश्यकता है। उनका यह विचार इस मुद्दे को केवल भावनात्मक नहीं बल्कि व्यावहारिक दृष्टिकोण से देखने की कोशिश है।
प्रकृति और इंसान के बीच संतुलन जरूरी
भागवत ने यह भी कहा कि समाज में मनुष्यों और अन्य प्राणियों के बीच संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी है। उन्होंने गाय के उदाहरण से यह समझाया—“जब हम गाय का दूध निकालते हैं तो थोड़ा दूध उसके बछड़े के लिए छोड़ते हैं। यह दिखाता है कि हमें स्वार्थ के साथ-साथ संवेदना भी रखनी चाहिए।” इसी तरह, कुत्तों को समाज से बाहर नहीं किया जा सकता, बल्कि उनका हिस्सा बनाकर, संतुलित उपायों के ज़रिए उनके साथ रहना सीखना होगा।
शेल्टर व्यवस्था केवल अस्थायी राहत
शेल्टरों में कुत्तों को रखना एक अस्थायी समाधान जरूर हो सकता है, लेकिन यह न तो व्यावहारिक है और न ही स्थायी। शेल्टरों में भीड़, संसाधनों की कमी और देखभाल की समस्या होती है। RSS प्रमुख का मानना है कि इससे बेहतर होगा कि सरकार और स्थानीय निकाय मिलकर प्रजनन नियंत्रण कार्यक्रमों पर ज़ोर दें, जिससे कुत्तों की संख्या धीरे-धीरे घटे और कोई भी जानवर न तो सड़कों पर भटके और न ही लोगों के लिए खतरा बने।
संवेदनशीलता के साथ समाधान की ज़रूरत
कुत्तों की समस्या केवल सुरक्षा से जुड़ी नहीं, बल्कि यह संवेदनशीलता, सहअस्तित्व और नीतियों की मजबूती से जुड़ा मुद्दा है। मोहन भागवत का दृष्टिकोण इस बात पर ज़ोर देता है कि हमें किसी भी समस्या का समाधान संतुलन और सह-अस्तित्व के मूल्यों के आधार पर करना चाहिए। जनसंख्या नियंत्रण जैसे उपाय न केवल इस समस्या का हल हैं, बल्कि वे भविष्य के लिए भी एक मानवीय और दीर्घकालिक रास्ता दिखाते हैं।