Mastiii 4 Review : अगर आप “मस्ती” फ्रेंचाइज़ से कुछ उम्मीद लेकर “Mastiii 4” देखने बैठते हैं- जैसे बेफिजूल की दीवानगी, थोड़ी-बहुत हैवानियत वाली वाइल्ड कॉमेडी या फिर कम से कम हल्की-फुल्की एडल्ट हंसी तो पहले ही बता दूँ कि इस बार आपको गहराई से निराशा हाथ लगने वाली है। फिल्म खुद को कॉमेडी बताती है, ट्रेलर में एडल्ट ह्यूमर का वादा करती है, लेकिन पर्दे पर आते ही ये दोनों ही चीजें फिसल कर कहीं गुम हो जाती हैं। न कहानी कस कर पकड़ पाती है, न मजाक हंसी ला पाते हैं, और पूरा अनुभव घिसे-पिटे सीन्स की बोरियत में बदल जाता है.
सबसे पहले बात करें फिल्म की स्क्रिप्ट की तो लगता है मानो राइटर्स ने बस पुराने “मस्ती” फॉर्मूले को दोहराने की कोशिश की, लेकिन न कहानी में कोई जान डाली और न ही स्थितियों में कोई ताजगी. वही शादीशुदा दोस्तों का तिकड़ी, वही गलतफहमियाँ, और वही बदनाम करने वाली परिस्थितियाँ लेकिन इस बार इनमें न चुलबुलापन है, न टाइमिंग. कई जगह तो आपको ऐसा महसूस होता है कि सीन्स बस जोड़ दिए गए हैं, ताकि किसी तरह फिल्म पूरी हो जाए. किरदारों में भी कोई ग्रोथ नहीं दिखती, बल्कि वे पहले से भी ज्यादा सपाट लगते हैं.
अभिनय की बात करें तो कलाकार पूरी कोशिश करते हैं, लेकिन जब स्क्रिप्ट ही खोखली हो, तो परफॉर्मेंस कितना संभाल पाएगी? रितेश देशमुख, विवेक ओबेरॉय और आफताब शिवदासानी अपने पुराने अंदाज़ में लौटने की कोशिश करते हैं, लेकिन चुटकुले इतने फीके हैं कि उनकी कॉमिक केमिस्ट्री भी असर नहीं दिखा पाती. सपोर्टिंग कास्ट का उपयोग भी गलत तरह से किया गया है. न उनके पास करने को कुछ है, न उनके किरदार कहानी में कोई योगदान देते हैं. कई बार पंचलाइन इतनी जबरदस्ती डाली जाती है कि हंसने के बजाय आप ऑडियंस की खामोशी सुनते हैं.
फिल्म का एडल्ट टैग भी बिल्कुल मिसगाइडिंग है. न इसमें बोल्डनेस है, न कोई ऐसा कंटेंट जो इसे “एडल्ट कॉमेडी” के दायरे में मजबूती से खड़ा करे। जो कुछ भी है वह या तो बचकाना है या बेहूदा, जिससे न मज़ा आता है, न माहौल बनता है. इसी तरह कॉमेडी का हिस्सा भी बेहद कमजोर है. न कोई स्मार्ट डायलॉग, न कोई नैचुरल ह्यूमर, और न ही ऐसा सिचुएशनल कॉमेडी जो आपको हंसने पर मजबूर करे। फिल्म कई बार अपने ही जोक्स पर अटकी हुई लगती है, मानो खुद को हंसाने की कोशिश कर रही हो.
कुल मिलाकर “Mastiii 4” देखने के बाद यही लगता है कि फ्रेंचाइज़ को मजबूरी में आगे बढ़ाया गया है, न कि किसी अच्छी कहानी या नए आइडिया के साथ। फिल्म न दीवानियत दिखाती है, न हैवानियत, और न ही वो पुरानी मस्ती वाली मस्ती. इसके बदले मिलती है सिर्फ खींची हुई, बेमज़ा बोरियत. यदि आप फुल-ऑन एंटरटेनमेंट या पुरानी तिकड़ी की जादुई कॉमेडी तलाश रहे हैं, तो यह फिल्म आपकी उम्मीदों पर पूरी तरह खरी नहीं उतरती। बेहतर है कि इस बार “मस्ती” को स्क्रीन पर नहीं, अपनी यादों में ही रहने दें.