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Panishment : इतिहास केवल युद्धों और राजाओं की कहानियों से नहीं बना है, बल्कि इसमें ऐसे अनगिनत अजीब और चौंकाने वाले तथ्यों की भरमार है जो हमारे सोचने के तरीके को बदल देते हैं। ऐसा ही एक रोचक और चौंकाने वाला पहलू है. गुदगुदी को सज़ा के रूप में इस्तेमाल करना. आज हम गुदगुदी को हंसी-मज़ाक या खेल समझते हैं, लेकिन प्राचीन काल में कई सभ्यताओं ने इसका उपयोग एक यातना (torture) के तरीके के रूप में भी किया था.
गुदगुदी को हल्का-फुल्का और मज़ेदार माना जाता है, लेकिन जब इसे जबरदस्ती, लंबे समय तक और नियंत्रण में किया जाए, तो यह व्यक्ति के लिए मानसिक और शारीरिक तौर पर बेहद कष्टदायक हो सकता है. प्राचीन चीन और जापान जैसी कुछ सभ्यताओं में, इसे एक "बिना खून बहाए दी जाने वाली कठोर सज़ा" माना जाता था. खासतौर पर राजनीतिक बंदियों या अपराधियों पर इसका उपयोग किया जाता था ताकि उन्हें अपमानित किया जा सके या जानकारी उगलवाई जा सके.
गुदगुदी की सज़ा कैसे दी जाती थी?
इस सज़ा में व्यक्ति को कसकर बांध दिया जाता था, खासकर उसके पैरों को, और फिर उनके तलवों को लगातार गुदगुदी किया जाता। कभी-कभी पंखों, ब्रश, या यहां तक कि बकरियों का इस्तेमाल किया जाता जो उनके पैरों को चाटती थीं. यह क्रिया घंटों तक चलती, जिससे व्यक्ति हँसी के मारे थक जाता, सांस रुकने लगती और शरीर पर अत्यधिक तनाव बन जाता। कई बार इस वजह से व्यक्ति बेहोश हो जाता या मानसिक संतुलन खो बैठता.
कुछ और अजीब और हैरान करने वाली सज़ाएं
1. लोहे की कुर्सी (Iron Chair):
यूरोप में यह कुर्सी कांटेदार होती थी जिस पर व्यक्ति को बैठाकर बांध दिया जाता, जिससे शरीर में दर्दनाक घाव हो जाते थे.
2. पानी की बूँद सज़ा (Chinese Water Torture):
यह सज़ा इतनी धीमी होती थी कि मानसिक संतुलन बिगड़ सकता था। व्यक्ति के माथे पर लगातार एक-एक बूँद पानी टपकाया जाता, जिससे धीरे-धीरे वह पागल हो जाता.
3. स्टॉक (Stock Punishment):
व्यक्ति के हाथ-पैर और सिर को लकड़ी के ढांचे में बंद कर सार्वजनिक जगह पर रखा जाता था ताकि लोग उसे देखकर हँसें, उस पर थूकें या अपमान करें.
4. बैल की प्रतिमा (Brazen Bull):
यह एक पीतल की बैल जैसी आकृति होती थी जिसमें अपराधी को बंद करके आग जलाते थे। व्यक्ति अंदर से जलता, और उसकी चीखें बैल की आवाज़ जैसी बाहर सुनाई देतीं.
जहां आज गुदगुदी को सिर्फ एक खेल समझा जाता है, वहीं प्राचीन समय में यह एक भयावह यातना का तरीका था। इतिहास में ऐसी कई अजीब और अमानवीय सजाएं मिलती हैं, जो इस बात की गवाही देती हैं कि इंसानी कल्पना सिर्फ निर्माण नहीं, विनाश में भी कितनी आगे जा सकती है. ऐसी कहानियाँ आज हमें न केवल चौंकाती हैं, बल्कि यह भी सोचने पर मजबूर करती हैं कि समय के साथ इंसान ने कितनी मानसिक प्रगति की है.