शुभमन गिल की टेस्ट कप्तानी की शुरुआत जितनी प्रभावशाली रही, अंत उतना ही निराशाजनक रहा. भारत ने पहली पारी में तीन शानदार शतकों की मदद से 471 रन बनाए, जिससे लगा कि टीम ने मुकाबले पर पकड़ मजबूत कर ली है. लेकिन चौथे दिन के खेल के बाद इंग्लैंड ने 371 रन का लक्ष्य महज़ 5 विकेट शेष रहते हासिल कर लिया और मुकाबला अपने नाम कर लिया. मैच के अधिकांश हिस्से में हावी रहने के बावजूद भारत ने कई अहम मौके गंवाए, जिन्हें इंग्लैंड ने पूरी तरह भुनाया और जीत छीन ली.
भारत शायद कुछ अलग रणनीति अपनाकर हालात को बदल सकता था, लेकिन युवा शुभमन गिल के लिए जो पहली बार टेस्ट में कप्तानी कर रहे थे यह एक तेज़ी से बदलता और सीख से भरा अनुभव रहा. इंग्लैंड ने पूरे मैच में आक्रामक रवैया बनाए रखा, जबकि भारत अहम मौकों पर चूकता रहा. आखिरी दिन की एक छोटी सी चूक ने जीत की ओर बढ़ती तस्वीर को हार में बदल दिया. आइए जानते हैं वो प्रमुख कारण, जिनकी वजह से भारत पहला टेस्ट मैच हार गया.
कैच छूटे, मैच छूटा
कहा जाता है कि 'कैच जीतते हैं मैच', लेकिन जब आप एक-दो नहीं बल्कि करीब 10 कैच छोड़ दें, तो हार तय मानी जा सकती है. यह विडंबना ही रही कि हेडिंग्ले जैसे मुश्किल फील्डिंग ग्राउंड पर दोनों टीमों से कैच छूटे, मगर भारत की मिसफील्डिंग ने ज्यादा नुकसान पहुंचाया. यशस्वी जायसवाल ने अकेले ही दोनों पारियों में कम से कम चार आसान कैच गिराए वो भी ओली पोप, बेन डकेट और हैरी ब्रूक जैसे अहम बल्लेबाज़ों के. इन ड्रॉप कैचों के बाद पोप ने 46, ब्रूक ने 16 और डकेट ने अपनी दोनों पारियों में क्रमशः 51 और 52 रन जोड़ डाले, जिससे इंग्लैंड को मैच में मजबूती मिली और भारत को भारी कीमत चुकानी पड़ी.
छूटे मौके पड़े भारी, नो बॉल ने बढ़ाया नुकसान
भारत की फील्डिंग की चूक यहीं खत्म नहीं हुई. पहली पारी में रविंद्र जडेजा ने बैकवर्ड पॉइंट पर एक आसान कैच छोड़ा, जबकि विकेटकीपर ऋषभ पंत ने हैरी ब्रूक का कैच टपकाया. इसके अलावा साई सुदर्शन से भी एक अहम मौका छूट गया. ब्रूक तो पहली पारी में शून्य पर आउट हो चुके थे, लेकिन जसप्रीत बुमराह की नो बॉल ने उन्हें जीवनदान दे दिया. जब मैच इतने करीबी अंतर से हार में बदला, तब यह साफ हो गया कि अगर ये मौक़े लपक लिए जाते, तो नतीजा शायद भारत के पक्ष में होता.
शतकों की चमक फीकी पड़ी
हेडिंग्ले टेस्ट में भारत के बल्लेबाजों ने इतिहास रचते हुए कुल पांच शतक लगाए. एक मैच में इतने शतक भारत की ओर से पहली बार देखने को मिले. यशस्वी जायसवाल (101), शुभमन गिल (147), केएल राहुल (137), और ऋषभ पंत (134 व 118) ने शानदार पारियां खेलीं. इसके बावजूद भारत टेस्ट इतिहास की पहली ऐसी टीम बन गई जिसने इतने शतकों के बावजूद हार का सामना किया. असली समस्या फिनिशिंग में नजर आई. दोनों पारियों में लोअर ऑर्डर पूरी तरह बिखर गया. पहली पारी में आखिरी 7 विकेट सिर्फ 41 रन पर गिरे. जबकि दूसरी पारी में 5 विकेट मात्र 35 रन पर ढह गए. जिससे बड़ी बढ़त की संभावना भी हाथ से निकल गई.
निचले क्रम की बड़ी नाकामी बनी हार की वजह
भारत की हार में निचले क्रम की विफलता ने अहम भूमिका निभाई. पहली पारी में टीम 430/3 के मजबूत स्कोर से 471 पर ऑल आउट हो गई, जबकि दूसरी पारी में 333/4 से सिर्फ 364 तक पहुंच सकी. दोनों बार जब शीर्ष बल्लेबाज आउट हुए, तो निचले क्रम ने पूरी तरह हथियार डाल दिए. भारत के नंबर 8 से 11 तक के बल्लेबाजों ने पहली पारी में क्रमशः 1, 0, 3 और 1 रन बनाए, जबकि दूसरी पारी में ये आंकड़े और भी खराब रहे — 4, 0, 0, 0. यानी दोनों पारियों में मिलाकर कुल सिर्फ 9 रन. इसके मुकाबले इंग्लैंड के आखिरी चार बल्लेबाजों ने अकेले पहली पारी में 72 रन जोड़कर टीम को मज़बूती दी और भारत को पीछे धकेल दिया.
संतुलन नहीं दिखा टीम में
भारत की टीम चयन और रणनीति को लेकर इस टेस्ट में कई सवाल खड़े हुए. चौथे सीमर के तौर पर शार्दुल ठाकुर को शामिल किया गया ताकि बल्लेबाजी में गहराई लाई जा सके, लेकिन उनका गेंद से इस्तेमाल हैरान करने वाला रहा. पहली पारी में उन्हें 40वें ओवर में गेंद सौंपी गई और उन्होंने सिर्फ 6 ओवर डाले जिसमें 6 से ज्यादा की इकॉनमी से रन लुटाए. दूसरी पारी में भले ही उन्होंने दो विकेट लिए, मगर उनका कुल प्रदर्शन बेहद सीमित रहा. ऐसा लगा मानो भारत 10 खिलाड़ियों के साथ खेल रहा हो. यदि उनका उपयोग इतना सीमित ही था, तो विकेट लेने वाले स्पिनर कुलदीप यादव या बेहतर बल्लेबाज नितीश रेड्डी को मौका देना ज़्यादा उचित होता.
इसके अलावा करुण नायर और साई सुदर्शन की बल्लेबाज़ी भी टीम के लिए फायदेमंद साबित नहीं हुई. नायर ने दोनों पारियों में सिर्फ 0 और 20 रन बनाए, जबकि सुदर्शन 0 और 30 रन ही जोड़ सके. इन योगदानों से टीम की बैटिंग लाइनअप में गहराई नहीं दिखी और भारत को नुकसान झेलना पड़ा.
बुमराह को नहीं मिला साथ
भारतीय गेंदबाजी अटैक में धार की कमी साफ नजर आई. सिर्फ जसप्रीत बुमराह ही पहले पारी में प्रभावी रहे, लेकिन बाकी गेंदबाजों का प्रदर्शन निराशाजनक रहा. मोहम्मद सिराज ने दूसरी पारी में लाइन-लेंथ में सुधार जरूर दिखाया पर विकेट लेने में नाकाम रहे. प्रसिद्ध कृष्णा दोनों पारियों में काफी महंगे साबित हुए और 6 से ज्यादा की इकॉनमी से रन लुटाए.
शार्दुल ठाकुर का प्रदर्शन भी दोनों विभागों में फीका रहा. ना गेंद से असर दिखा पाए, ना बल्ले से योगदान दे सके. दूसरी पारी में खुद बुमराह भी कोई खास प्रभाव नहीं छोड़ सके, जिससे इंग्लैंड के बल्लेबाजों को लक्ष्य हासिल करने में ज्यादा मुश्किल नहीं हुई.
‘बैजबॉल’ के तूफान में उड़ गया भारत का दबदबा
भारत की तमाम गलतियों और चूकों के बावजूद टीम ने इंग्लैंड के सामने 371 रन का बड़ा लक्ष्य रखा था. ऐसा स्कोर भारत के खिलाफ इतिहास में सिर्फ एक बार सफलतापूर्वक चेज़ हुआ था. वो भी तीन साल पहले इंग्लैंड द्वारा ही. बारिश की संभावना, पांचवें दिन की पिच और करीब 4 रन प्रति ओवर का रनरेट देखते हुए लग रहा था कि भारत के पास जीत का बढ़िया मौका है. लेकिन इंग्लैंड की आक्रामक 'बैजबॉल' शैली के आगे ये सभी आंकड़े और परिस्थितियां बौनी साबित हुईं.
बेन डकेट ने रफ पर खड़े होकर रिवर्स स्वीप से शतक ठोका, क्रॉली और जो रूट ने अर्धशतक जमाए और अंत में जेमी स्मिथ ने मैच को आक्रामक अंदाज़ में खत्म किया. इंग्लैंड की रणनीति साफ थी कि मैच को अंतिम दिन तक खींचो और फिर तेजी से रन बनाकर विरोधी टीम को दबाव में डालकर जीत हासिल करो और इस बार भी वही प्लान पूरी तरह सफल रहा.