उत्तर प्रदेश में जातीय और सामुदायिक संघर्ष एक नए उभार पर पहुंच गया है, जहाँ करणी सेना, ब्राह्मण महासभा, अहीर रेजिमेंट और भीम आर्मी जैसे समूह न केवल सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को लेकर टकरा रहे हैं, बल्कि कानून-व्यवस्था और चुनावी राजनीति के केंद्र में भी आ चुके हैं. हाल ही में आगरा–अलीगढ़ में सपा सांसद रामजी लाल सुमन के काफिले पर हमला, इटावा में कथावाचकों से जबरदस्ती और प्रयागराज में भीम आर्मी समर्थकों का पुलिस वाहन में आग लगाना इन घटनाओं ने जातीय ध्रुवीकरण और सामाजिक असंतुलन को तेज कर दिया है. ये घटनाएं स्पष्ट करती हैं कि ऊपरी जातियों के संगठन अपनी सांस्कृतिक रक्षा के नाम पर सक्रिय हैं, जबकि OBC–दलित समूह न्याय, आत्मसम्मान और पहचान की राजनीति में शामिल हो चुके हैं. यह पूरा परिदृश्य 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियों पर भी गहरा असर डाल रहा है.
धार्मिक उन्माद से बिगड़ा माहौल
उत्तर प्रदेश में जातीय और सामुदायिक तनाव नए रूप में उभर रहा है. हाल ही में करणी सेना, अहीर रेजिमेंट, ब्राह्मण महासभा और भीम आर्मी जैसे संगठनों के बीच संघर्ष ने सामाजिक संतुलन को चुनौती दी है. इन समूहों द्वारा कई जिलों में धार्मिक और जातीय उत्पीड़न के आरोपों से स्थिति और जटिल होती जा रही है.
हाल के कुछ प्रमुख घटनाक्रम
1. करणी सेना – सांसद रामजी लाल सुमन पर हमले
आगरा में करणी सेना के कार्यकर्ताओं ने सपा सांसद रामजी लाल सुमन के समर्थन में रैली निकालकर उनके अपमान पर विरोध जताया, जिसमें आरोप है कि कई वाहनों को क्षतिग्रस्त किया गया था.
2. इटावा में कथावाचकों पर हमला
इटावा जिले के एक गांव में यादव समुदाय के कथावाचकों मुकुट मणि सिंह और संत सिंह यादव पर हमला किया गया और उनके साथ अमानवीय व्यवहार किया गया, कहा गया कि कथावाचकों ने कथित रूप से अपनी जाति छुपाई थी. इस पर करणी सेना, ब्राह्मण महासभा और अहीर रेजिमेंट के बीच विवाद खड़ा हो गया है.
3. भीम आर्मी – यूपी पुलिस आमने-सामने
प्रयागराज में आज़ाद समाज पार्टी समर्थकों ने पुलिस को निशाना बनाते हुए गाड़ियों को आग के हवाले किया और विरोध प्रदर्शन किया, क्योंकि उन्हें कौशांबी और करछना की घटनाओं में उचित न्याय की मांग थी.
2027 विधानसभा चुनाव पर सीधा असर
इन घटनाओं में राजनीतिक दलों की भूमिका स्पष्ट देखी जा रही है. BJP को करणी सेना द्वारा समर्थित बताते हुए सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने आरोप लगाए हैं. वहीं यादव महासभा और अहीर रेजिमेंट जैसी कथित OBC संगठनों के सक्रिय होने से सपा को उम्मीद है कि वह OBC–दलित वोटों को जोड़ पाएगा.बता दें कि उत्तर प्रदेश में जातीय समीकरण हमेशा चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा रहे हैं. अब यह नया मोड़ आगामी चुनावी परिदृश्य को पूरी तरह से बदल सकता है.
सांप्रदायिक सौहार्द पर डाल सकती हैं असर
उत्तर प्रदेश में इन संगठनों की गतिविधियों का तीव्रता से उभरना न सिर्फ जातीय संघर्ष को हवा दे रहा है, बल्कि सांप्रदायिक सौहार्द को भी गहराई से प्रभावित कर सकता है. । इटावा के मामले को लेकर भी में अखिलेश यादव इसे बीजेपी की ‘जातिगत विभाजन रणनीति’ करार देते हुए आलोचना कर चुके हैं. उन्होंने कहा है कि यह राज्य के सामाजिक संतुलन को ध्वस्त करने की साजिश हो सकती है.
प्रदेश में धार्मिक और जातीय पहचान के आधार पर ध्रुवीकरण जोरों पर है. एक तरफ सांस्कृतिक –धार्मिक प्रतीकों के इर्द‑गिर्द सांप्रदायिक उन्माद प्रवाहित हो रहा है, वहीं दूसरी ओर न्याय और गरिमा की राजनीति इसे और तीव्र बना रही है. अगर इस रूप में संघर्ष गहराता है, तो गंगा जमुनी तहज़ीब पर भी गहरा असर पड़ेगा, जो उत्तर प्रदेश की सामाजिक एकता की नींव रहा है.
आखिर फायदा किसका?
जातीय-सामुदायिक संघर्ष केवल हिंसा नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की 2027 की राजनीति का प्रभावशाली बदलाव का उपकरण बन चुका है.वास्तव में सपा, बीजेपी, बीएसपी, भीम आर्मी जैसे मुख्य राजनीतिक दल इन्हें रणनीतिक अवसर के रूप में देख रहे हैं.
सपा जहां जातीय/न्यायीक मुद्दों से PDA गठबंधन मजबूत कर रही है। वहीं BJP सांप्रदायिक और हिंदुत्व-आधारित रुझानों को उजागर कर शासकीय मुकाम बनाए रखना चाहती है. वहीं भीम आर्मी और BSP के बीच दलित वोट बैंक की खींचतान भी दिख रही है.