5 साल से कम उम्र के बच्चे की कस्टडी किसे मिलती है? : भारत में जब पति-पत्नी के बीच तलाक, अलगाव या पारिवारिक विवाद होता है, तब सबसे बड़ा सवाल बच्चे की कस्टडी को लेकर उठता है। खासकर तब, जब बच्चा 5 साल से कम उम्र का हो। भारतीय कानून और अदालतें ऐसे मामलों में सबसे पहले बच्चे के भविष्य, सुरक्षा और मानसिक विकास को प्राथमिकता देती हैं। सामान्यतः माना जाता है कि छोटे बच्चे को मां की ज्यादा जरूरत होती है, इसलिए अदालतें अक्सर मां को कस्टडी देने की ओर झुकाव रखती हैं.
कानून क्या कहता है?
भारतीय कानून के अनुसार पिता को बच्चे का “प्राकृतिक अभिभावक” माना जाता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर हाल में कस्टडी पिता को ही मिलेगी। यदि बच्चा 5 वर्ष से कम आयु का है, तो अदालत आमतौर पर मां की देखरेख को अधिक उपयुक्त मानती है। इसका कारण यह है कि इतनी कम उम्र में बच्चे को भावनात्मक लगाव, देखभाल और पालन-पोषण की अधिक आवश्यकता होती है.
किन परिस्थितियों में पिता को मिल सकती है कस्टडी?
हालांकि अधिकतर मामलों में छोटे बच्चे की कस्टडी मां को मिलती है, लेकिन यह कोई स्थायी नियम नहीं है। यदि अदालत को लगे कि मां बच्चे की ठीक से देखभाल नहीं कर पा रही है, या उसकी आर्थिक, मानसिक या सामाजिक स्थिति बच्चे के हित में नहीं है, तब पिता को भी कस्टडी दी जा सकती है। अदालत यह देखती है कि कौन-सा अभिभावक बच्चे को बेहतर शिक्षा, सुरक्षित वातावरण और अच्छा भविष्य दे सकता है.
अदालत किन बातों पर फैसला करती है?
कस्टडी तय करते समय फैमिली कोर्ट कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर विचार करती है। इनमें माता-पिता की आय, रहने का माहौल, बच्चे की स्वास्थ्य जरूरतें, भावनात्मक जुड़ाव और बच्चे की सुरक्षा शामिल होती है। यदि बच्चा थोड़ा बड़ा है और अपनी इच्छा बता सकता है, तो अदालत उसकी राय भी सुन सकती है। लेकिन 5 साल से कम उम्र के बच्चों में यह निर्णय पूरी तरह अदालत के विवेक और बच्चे के हित पर आधारित होता है.
मुलाकात का अधिकार भी महत्वपूर्ण
अगर कस्टडी मां को मिलती है, तब भी पिता को बच्चे से मिलने का अधिकार दिया जा सकता है। अदालतें कोशिश करती हैं कि बच्चा दोनों माता-पिता के प्यार और मार्गदर्शन से वंचित न रहे। कई मामलों में “विजिटेशन राइट्स” तय किए जाते हैं, जिनके तहत पिता निश्चित समय पर बच्चे से मिल सकता है.
भारत में 5 साल से कम उम्र के बच्चे की कस्टडी अधिकतर मामलों में मां को मिलने की संभावना रहती है, लेकिन अंतिम फैसला अदालत बच्चे के सर्वोत्तम हित को ध्यान में रखकर करती है। यदि पिता यह साबित कर दे कि वह बच्चे को बेहतर जीवन और सुरक्षित माहौल दे सकता है, तो अदालत उसके पक्ष में भी निर्णय दे सकती है। इसलिए हर मामला परिस्थितियों और सबूतों के आधार पर अलग-अलग तय किया जाता है.