बीजेपी 22 राज्यों में अपने प्रदेश अध्यक्ष का चुनाव कर चुकी हैं. लेकिन उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष को लेकर बीजेपी अभी भी उलझनों में है। क्योंकि बीजेपी जानती है कि उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष का चेहरा आगामी विधानसभा चुनाव 2027 की दिशा तय करेगा। बीजेपी अपने प्रदेश अध्यक्ष के बहाने सपा की पीडीए वाली सियासत का काउंटर प्लान तैयार करना चाहती है। इसलिए पिछले विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए वह किसी भी तरह का रिस्क उठाना नहीं चाहती। उत्तर प्रदेश में बीजेपी के नए प्रदेश अध्यक्ष को लेकर मंथन जारी है। भूपेंद्र चौधरी का कार्यकाल समाप्त हो चुका है, लेकिन पार्टी नए चेहरे के ऐलान से अभी तक बच रही है। वजह है।
जातीय और सियासी समीकरण
पार्टी को 2027 विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर ऐसा चेहरा चाहिए जो सपा के पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले की काट बन सके। योगी आदित्यनाथ पहले से ही सत्ता में हैं, जो ठाकुर समाज से आते हैं। ऐसे में बीजेपी संगठन में ओबीसी या दलित को मौका देना चाहती है, जिससे संतुलन बना रहे। लेकिन इटावा प्रकरण के बाद ब्राह्मणों की नाराजगी को भी भुनाने की कोशिश है। पार्टी तय नहीं कर पा रही है कि ब्राह्मण को कमान सौंपे या ओबीसी-दलित को प्राथमिकता दे।
सपा के पीडीए फॉर्मूले का दबाव
बीजेपी यूपी में अपने नए प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर सियासी नफा-नुकसान का आकलन करने में जुटी है. यूपी में पिछले तीन प्रदेश ओबीसी समुदाय से ही बनते आ रहे हैं। 2014 के बाद केशव प्रसाद मौर्य और उसके बाद स्वतंत्र देव सिंह और 2022 के बाद भूपेंद्र चौधरी को प्रदेश संगठन की बागडोर सौंपी थी। बीजेपी के तीनों ही नेता ओबीसी समाज से आते हैं। इसके चलते माना जा रहा था किसी सवर्ण समाज को बागडोर सौंपी जाए। 2024 के लोकसभा चुनाव में जिस तरह सपा ने पीडीए यानी पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक का समीकरण सेट किया तो बीजेपी चारो खाने चित हो गई। यूपी में बीजेपी की सीटें 62 से घटकर 33 पर आ गई। ऐसे में बीजेपी अपने प्रदेश अध्यक्ष के बहाने सपा की पीडीए वाली सियासत का काउंटर प्लान तैयार करना चाहती है। बीजेपी 2027 चुनाव से पहले सपा के पीडीए की काट तलाश लेना चाहती है, जिसके लिए किसी ओबीसी या फिर दलित को प्रदेश अध्यक्ष बनाने के लिए मंथन कर रही है।
भाजपा में कई नामों पर चल रहा मंथन
ओबीसी वर्ग से बीएल वर्मा, धर्मपाल सिंह, बाबूराम निषाद और अशोक कटारिया जैसे नाम चर्चा में हैं। वहीं ब्राह्मण समुदाय से कठेरिया और विद्यासागर सोनकर के नाम लिए जा रहे हैं। संगठन में संतुलन बनाते हुए ऐसा नेता चाहिए जो चुनावी जीत दिलाने के साथ सामाजिक समीकरण भी साध सके।
सियासी जानकारों का कहना है कि बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष का पद सिर्फ भरना नहीं है बल्कि उसके जरिए राजनीतिक समीकरण साधने हैं।
कब होगा ऐलान?
बीजेपी ने 22 राज्यों में अपने अध्यक्ष घोषित कर दिए हैं। अब यूपी पर सबकी निगाहें हैं। संभावना है कि राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव के बाद यूपी अध्यक्ष की घोषणा की जाएगी। हालांकि संगठनात्मक प्रक्रियाओं के चलते यह प्रक्रिया 4-5 दिन का वक्त ले सकती है। देश के 37 प्रदेश यूनिट्स भाजपा ने देश भर में बना रखी हैं, जिनमें से 22 का चुनाव हो गया है। इस तरह कोरम पूरा है और कभी भी राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव कराया जा सकता है। इसीलिए यूपी अध्यक्ष चुनने के लिए नेतृत्व वक्त भी ले सकता है। बीजेपी अपने नए राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव के बाद यूपी में प्रदेश अध्यक्ष का फैसला ले सकती है।