आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव जो 2027 में होने हैं उनकी तैयारी में राजनीतिक दल अपनी सियासी रणनीतियां पुख्ता करने में लग गए हैं. ऐसे समय में जहां बीजेपी और कांग्रेस दोनों की नज़र मुस्लिम वोटबैंक पर हैं, वहीं सपा के प्रमुख अखिलेश यादव ने स्थानीय मुस्लिम समुदाय विशेषकर ‘पसमांदा मुसलमान’ को साधने की रणनीति अपनाई है.
पीएम मोदी की तर्ज पर ‘पसमांदा मुसलमान’ फोकस
अखिलेश यादव ने लखनऊ के डॉ. राममनोहर लोहिया सभागार में पसमांदा मुस्लिम नेता अनीस मंसूरी की अध्यक्षता में एक बैठक की. इसमें सपा विधायक आशु मलिक, इलियास मंसूरी, वसीम राईनी, महबूब आलम अंसारी, दौलत अली घोसी, शेख सलाहुद्दीन और अन्य नेता शामिल रहे.
यह बैठक मोदी सरकार द्वारा पहले ही अपनाया जा रहा पसमांदा मुस्लिम समुदाय को राजनीतिक तौर पर शामिल करने वाले मोबिलाइज़ेशन फॉर्मूले पर कड़ा जवाब थी.
यूपी में राजनीतिक दलों का पावर हाउस पसमांदा मुस्लिम
15–20%* ‘अशराफ’ मुसलमान (शेख, पठान, सैय्यद, आदि) हैं.
80–85% पसमांदा मुसलमान हैं, जो ओबीसी जातियों से आते हैं.
यह समुदाय अब तक पर्याप्त प्रतिनिधित्व का दावा करता आ रहा है और तमाम राजनीतिक दल के लिए यह सियासी पावरहाउस की तरह है.
सपा की योजनाएं और बीजेपी की चुनौती
अखिलेश ने बैठक के दौरान दावा किया कि सपा सरकार ने पहले बुनकर पसमांदा मुसलमानों के लिए योजनाएं चलाईं और भाजपा सरकार ने इन्हें दूर किया. उन्होंने दोबारा सत्ता में आने पर इन्हें प्रशिक्षण, मार्केट लिंक और नई तकनीकों से जोड़ने का भरोसा दिया है.
सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने स्पष्ट कहा है कि पसमांदा समाज तभी खुशहाली पाएगा, जब यूपी में बीजेपी को हराकर समाजवादी सरकार बनेगी.
‘पीडीए’ फॉर्मूला में मुस्लिम समुदाय
बीजेपी ने पहले से ही पीएम मोदी की नीति के अनुरूप युवा मुस्लिम ओबीसी वोट बैंक को अपनी तरफ खींचना शुरू कर दिया था. ऐसे में सपा ने विरोधी रणनीति अपनाते हुए ‘पीडीए—पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक’ गठबंधन में पसमांदा मुसलमानों को जोड़ दिया है.
यह गठबंधन कांग्रेस सांसद इमरान मसूद की उस टिप्पणी का प्रतिफल भी दिखा रहा है जिसमें उन्होंने सवाल उठाया था कि इस फॉर्मूले में मुस्लिम समुदाय कहां है.
पिछली जनगणना में मुस्लिम वोटों का असर
2022 में सपा को 85% मुस्लिम वोट मिले थे.
2024 लोकसभा चुनाव में सपा ने 90% मुस्लिम वोट हासिल किए.
ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि 80% से अधिक मुस्लिम वोटर जो पसमांदा समुदाय का हिस्सा हैं उनकी भूमिका निर्णायक हो सकती है. अखिलेश की यह कवायद इसी सोच का हिस्सा है.
सियासत की चेसबोर्ड पर क्या होगा सपा का मेक- मूव?
1. पसमांदा मुस्लिमों को जागरूक करना और संगठनात्मक समावेश
2. बीजेपी की रणनीति का मुकाबला करने के लिए सपा को इस समुदाय में एक मजबूत गठबंधन बनाना होगा
3. जातिगत जनगणना में बढ़ी हिस्सेदारी की उम्मीद और उससे प्राप्त आंकड़ों के इस्तेमाल की रणनीति तैयार करनी होगी.
बहरहाल पीएम मोदी की राह पर चलते हुए अखिलेश यादव ने पसमांदा मुस्लिमों को अपनी सियासत में शामिल करने की रणनीति अपनाई है. यह स्टेप यूपी की सियासत में मुस्लिम समुदाय की व्यापकता और उसकी प्रभावशाली भूमिका को पहचानते हुए 2027 चुनाव की तरफ बढ़ते चरण का महत्वपूर्ण संकेत है. अब सवाल यह है कि क्या यह भय से प्रेरित कदम सपा को चुनावी सफलता दिला पाएगा?