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Facts : क्या मौत के बाद दोबारा ज़िंदगी मिल सकती है? यह सवाल विज्ञान और मानवता दोनों के लिए सदियों से जिज्ञासा का विषय रहा है. आज तकनीक के दौर में कुछ वैज्ञानिक इस सवाल का जवाब "हां" में देने की कोशिश कर रहे हैं और यही सोच है क्रायोनिक्स (Cryonics) के पीछे. दुनिया भर में अब तक 250 से ज़्यादा मृत लोगों के शरीरों को बेहद कम तापमान पर बर्फ़ (liquid nitrogen) के नीचे सुरक्षित रखा गया है, इस उम्मीद में कि भविष्य में जब मेडिकल साइंस और टेक्नोलॉजी इतनी विकसित हो जाएगी कि मौत को पलट सके, तब इन लोगों को दोबारा ज़िंदा किया जा सकेगा.
क्रायोनिक्स क्या है?
क्रायोनिक्स एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसमें इंसान या जानवर के मृत शरीर को -196 डिग्री सेल्सियस तापमान पर liquid nitrogen में संरक्षित किया जाता है. यह प्रक्रिया शरीर को इस तरह से 'फ्रीज़' करती है कि कोशिकाओं को और ज्यादा नुकसान न पहुंचे। जब किसी इंसान को कानूनी रूप से मृत घोषित किया जाता है, तब तुरंत उसके शरीर को ठंडा करके इस प्रक्रिया की शुरुआत की जाती है.
इसे करने के पीछे सोच क्या है?
इस तकनीक के समर्थकों का मानना है कि मृत्यु कोई स्थायी अवस्था नहीं है, बल्कि यह सिर्फ एक "temporary failure" है. जिसे भविष्य में सुधारा जा सकता है. उनका विश्वास है कि जैसे-जैसे मेडिकल साइंस आगे बढ़ेगी, कैंसर, हार्ट अटैक या न्यूरोलॉजिकल बीमारियों को पूरी तरह ठीक किया जा सकेगा। तब इन बर्फ़ में रखे गए शरीरों को पुनर्जीवित किया जा सकेगा.
कहाँ हो रहा है ये सब?
क्रायोनिक्स की सेवाएं मुख्य रूप से अमेरिका और रूस में उपलब्ध हैं. अमेरिका की Alcor Life Extension Foundation और रूस की KrioRus जैसी कंपनियां इस सेवा को प्रदान करती हैं. इस प्रक्रिया की क़ीमत भी लाखों डॉलर तक होती है. कुछ लोग केवल दिमाग (Brain Cryopreservation) को सुरक्षित रखते हैं, जबकि कुछ पूरा शरीर.
क्या यह सच में संभव है?
फिलहाल वैज्ञानिक समुदाय में क्रायोनिक्स पर काफी विवाद है. बहुत से वैज्ञानिक इसे सिर्फ एक कल्पना या विज्ञान-कथा (sci-fi) मानते हैं, क्योंकि अब तक एक भी शरीर को दोबारा ज़िंदा नहीं किया जा सका है. लेकिन इसके बावजूद, कुछ लोग इसे "आखिरी उम्मीद" के तौर पर अपनाते हैं. खासकर वे, जो जीवन और मृत्यु की सीमाओं को चुनौती देना चाहते हैं.
क्रायोनिक्स एक ऐसी तकनीक है जो आज के विज्ञान से कहीं आगे की सोच रखती है. भले ही यह अब तक सफल नहीं हुई हो, लेकिन यह इंसानी जिज्ञासा, उम्मीद और भविष्य में बेहतर चिकित्सा की आशा का प्रतीक है. आने वाले वर्षों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या विज्ञान सच में मौत को मात देने में सफल हो पाता है या नहीं.