Petrol vs Diesel Car Price: जब आप नई कार खरीदने शोरूम जाते हैं, तो अक्सर देखने को मिलता है कि एक ही मॉडल की कार में डीजल वेरिएंट, पेट्रोल की तुलना में 1 से 3 लाख रुपये तक महंगा होता है। बहुत से लोग इस कंपनियों का मुनाफा समझ लेते हैं, लेकिन असली वजह इंजन की खास बनावट भारी तकनीक और सख्त सरकारी नियम हैं। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि कंपनी किस चीज का एक्स्ट्रा पैसा लेती है।
ज्यादा मजबूत इंजन की बनावट
डीजल इंजन में हवा और ईंधन को पेट्रोल के मुकाबले बहुत ज्यादा दबाव के साथ जलाया जाता है। इंजन का दबाव 2000 बार से भी ऊपर चला जाता है। इतने भारी प्रेशर को झेलने के लिए डीजल इंजन के पुर्जे बेहद मजबूत और सटीक बनाए जाते हैं। इसके अलावा इनमें टर्बोचार्जर, इंटरकूलर और एडवांस्ड फ्यूल इंजेक्टर जैसे महंगे पार्ट्स का इस्तेमाल होता है, जिससे लागत बढ़ जाती है।
धुआं रोकने वाले तकनीक और नियम
डीजल का धुआं ज्यादा नुकसानदायक होता है। BS6 और BS6 फेज-2 नियमों का पालन करने के लिए डीजल कारों में DPF, SCR सिस्टम और AdBlue जैसे महंगे कैटालिटिक कन्वर्टर लगाने पड़ते हैं। यह सिस्टम धुएं के बारीक और जहरीले कणों को बाहर निकालने से रोकता है। इसी भारी खर्च के चलते कई कार कंपनियों ने छोटे डीजल इंजन बनाना ही बंद कर दिया।
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क्या वसूल होता है पैसा
दिल्ली में डीजल, पेट्रोल से लगभग 7 रुपये प्रति लीटर सस्ता है और डीजल कारें माइलेज भी ज्यादा देती हैं। इसके बावजूद अगर आप साल में लगभग 15,000 किलोमीटर गाड़ी चलाते हैं, तो एक्स्ट्रा खर्च निकालने में 5 साल से ज्यादा लग सकते हैं। साथ ही, टर्बोचार्जर और DPF जैसे पार्ट्स के कारण डीजल कार की सर्विस और मेंटेनेंस भी पेट्रोल से ज्यादा महंगी होती है। रोज लंबा सफर करने वालों के लिए डीजल फायदे का सौदा है, जबकि शहर में कम चलाने वालों के लिए पेट्रोल बेहतर रहता है।