7–8 साल की उम्र में लड़कियों को प्यूबर्टी आना क्या सामान्य है? आजकल कई माता-पिता यह देखकर चिंतित हो जाते हैं कि उनकी बेटियों में बहुत कम उम्र में प्यूबर्टी यानी शारीरिक बदलाव दिखाई देने लगे हैं। पहले जहां लड़कियों में किशोरावस्था के लक्षण 11 से 13 साल की उम्र में शुरू होते थे, वहीं अब कुछ मामलों में 7 या 8 साल की उम्र में ही शरीर में बदलाव देखने को मिल रहे हैं। डॉक्टर इसे “अर्ली प्यूबर्टी” या “प्रिकॉशियस प्यूबर्टी” कहते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार कुछ हद तक यह सामान्य हो सकता है, लेकिन हर मामले में इसे नजरअंदाज करना सही नहीं माना जाता.
क्या 7–8 साल में प्यूबर्टी सामान्य मानी जाती है?
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक यदि लड़की में 8 साल से पहले स्तनों का विकास, शरीर में तेजी से बदलाव, अंडरआर्म या प्राइवेट पार्ट्स में बाल आना या पीरियड्स शुरू होने जैसे लक्षण दिखें, तो इसे जल्दी प्यूबर्टी माना जाता है। हालांकि कुछ बच्चों में यह बदलाव प्राकृतिक रूप से भी हो सकते हैं, लेकिन लगातार बढ़ते मामलों ने डॉक्टरों की चिंता बढ़ाई है। कई रिसर्च में पाया गया है कि आज की जीवनशैली और खान-पान इसका बड़ा कारण बन रहे हैं.
जल्दी प्यूबर्टी आने के मुख्य कारण
विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों में मोटापा तेजी से बढ़ना अर्ली प्यूबर्टी का सबसे बड़ा कारण बन रहा है। जंक फूड, पैकेट वाले खाद्य पदार्थ, ज्यादा चीनी और हार्मोन युक्त भोजन शरीर के हार्मोन संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं। इसके अलावा मोबाइल और स्क्रीन का अधिक उपयोग, कम शारीरिक गतिविधि और तनाव भी बच्चों के शरीर पर असर डालते हैं.
कुछ मामलों में यह समस्या जेनेटिक यानी पारिवारिक कारणों से भी हो सकती है. यदि मां या परिवार में किसी महिला को कम उम्र में प्यूबर्टी आई हो, तो बच्ची में भी ऐसा होने की संभावना बढ़ सकती है। वहीं दुर्लभ मामलों में हार्मोनल बीमारी, थायरॉइड समस्या या दिमाग से जुड़े कुछ मेडिकल कारण भी जिम्मेदार हो सकते हैं.
बच्चों पर क्या असर पड़ता है?
कम उम्र में प्यूबर्टी आने से केवल शारीरिक ही नहीं बल्कि मानसिक प्रभाव भी पड़ सकता है. बच्चियां अपनी उम्र से ज्यादा बड़ी दिखने लगती हैं, जिससे वे असहज महसूस कर सकती हैं। कई बार उन्हें स्कूल या समाज में शर्मिंदगी और मानसिक तनाव का सामना करना पड़ता है. डॉक्टरों के अनुसार जल्दी प्यूबर्टी बच्चों की हाइट पर भी असर डाल सकती है क्योंकि हड्डियों का विकास जल्दी रुक सकता है.
क्या है इसका इलाज और बचाव?
यदि बच्ची में कम उम्र में प्यूबर्टी के संकेत दिखाई दें, तो तुरंत बाल रोग विशेषज्ञ या एंडोक्राइनोलॉजिस्ट से सलाह लेना जरूरी है। डॉक्टर जरूरत पड़ने पर हार्मोन टेस्ट, एक्स-रे या अन्य जांच कर सकते हैं। कुछ मामलों में दवाओं के जरिए प्यूबर्टी की प्रक्रिया को नियंत्रित भी किया जाता है.
विशेषज्ञ बच्चों को संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और कम स्क्रीन टाइम देने की सलाह देते हैं। घर का पौष्टिक खाना, पर्याप्त नींद और मानसिक रूप से स्वस्थ माहौल बच्चों के हार्मोन संतुलन को बेहतर बनाए रखने में मदद कर सकता है.
7–8 साल की उम्र में प्यूबर्टी आना कुछ मामलों में सामान्य हो सकता है, लेकिन इसे हल्के में लेना सही नहीं है। समय रहते डॉक्टर की सलाह और सही जीवनशैली अपनाकर इस स्थिति को बेहतर तरीके से संभाला जा सकता है। माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों के शारीरिक और मानसिक बदलावों पर ध्यान दें और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ से संपर्क करें.