भारत में जनगणना की प्रक्रिया 2027 तक पूरी होने की योजना है, जो दो चरणों में संपन्न होगी. पहला चरण अक्टूबर 2026 में जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी राज्यों में शुरू होगा, जबकि दूसरा चरण मार्च 2027 तक पूरे देश में चलेगा. इस बार की जनगणना में जातीय डेटा भी शामिल किया जाएगा, जो 1931 के बाद पहली बार हो रहा है. 16 जून 2025 को जनगणना की अधिसूचना जारी होगी. इस प्रक्रिया के दौरान उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव भी हो सकते हैं, जिससे यह समय राज्य की राजनीति के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है.
दो चरणोँ में होगी जनगणना
आगामी जनगणना 2027 में दो चरणों में संपन्न होगी. पहला चरण अक्टूबर 2026 में जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी राज्यों में शुरू होगा. दूसरा चरण पूरे देश में 1 मार्च 2027 तक चलेगा. इस बार की जनगणना में जातीय डेटा भी शामिल किया जाएगा, जो 1931 के बाद पहली बार हो रहा है.
चुनाव के करीब जारी होंगे आंकड़े
संभावना है कि जनगणना के पहले आंकड़े 1 मार्च 2027 तक जारी होंगे , जो यूपी विधानसभा चुनाव 2027 के समय के आसपास होंगे. इस दौरान जातीय जनगणना भी चल रही होगी, जिससे राज्य की राजनीति में नई दिशा मिल सकती है. सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने दावा किया है कि यदि पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) गठबंधन की सरकार बनती है, तो जातीय जनगणना की प्रक्रिया शुरू की जाएगी. उन्होंने इसे सामाजिक न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है.
यूपी में सभी दल कर रहे मांग
उत्तर प्रदेश में जातीय जनगणना की मांग राजनीतिक दलों के बीच एक महत्वपूर्ण मुद्दा है. सपा, बसपा, कांग्रेस और अपना दल (एस) सहित विभिन्न दलों ने राज्य में जातीय जनगणना कराने की मांग की है. इन दलों का कहना है कि जातीय जनगणना से समाज के वंचित वर्गों को उनका हक मिल सकेगा और सामाजिक न्याय सुनिश्चित होगा.
हालांकि, भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगी दलों ने इस मुद्दे पर मिश्रित प्रतिक्रिया दी है. कुछ नेताओं ने जातीय जनगणना के पक्ष में बयान दिए हैं, जबकि कुछ ने इसे राजनीतिक मुद्दा बताया है. जैसे सुभासपा के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर और निषाद पार्टी के नेता संजय निषाद ने जातीय जनगणना की आवश्यकता पर जोर दिया है, लेकिन साथ ही सपा पर यह आरोप भी लगाया है कि उन्होंने सत्ता में रहते हुए इस मुद्दे पर कोई ठोस कदम नहीं उठाए.
कुल मिलाकर, उत्तर प्रदेश में जातीय जनगणना को लेकर राजनीतिक दलों के बीच मतभेद स्पष्ट हैं. यह मुद्दा आगामी विधानसभा चुनावों में एक प्रमुख चुनावी मुद्दा बन सकता है, जो समाज के विभिन्न वर्गों के बीच समानता और न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.