यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन के नए नियमों को लेकर गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हुई। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच इस मामले को सुन रही थी। सुनवाई के दौरान उस वक्त माहौल गरमा गया जब सुझाव आया कि अलग अलग जातियों के छात्रों के लिए अलग हॉस्टल होने चाहिए। इस पर सीजेआई साफ तौर पर नाराज दिखे और उन्होंने इसे समाज को पीछे ले जाने वाली सोच बताया।
अलग हॉस्टल के प्रस्ताव पर CJI की नाराजगी
सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि ऐसी बातें सुनकर हैरानी होती है। उन्होंने कहा कि हम सभी अलग अलग जातियों के साथ हॉस्टल में रहे हैं और आज देश में इंटर कास्ट शादियां भी हो रही हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि 75 साल में जो समाज आगे बढ़ा है क्या अब उसे फिर पीछे ले जाने की तैयारी है। कोर्ट ने कहा कि यह सोच वर्गहीन समाज के विचार के खिलाफ है।
रैगिंग और सांस्कृतिक भेदभाव पर सवाल
सीजेआई ने कॉलेजों में रैगिंग के मुद्दे पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि कई बार उत्तर भारत या नॉर्थ ईस्ट से आने वाले छात्रों के साथ उनके खानपान और संस्कृति को लेकर टिप्पणियां की जाती हैं। कोर्ट ने पूछा कि क्या ऐसे मामलों को नए नियमों में ठीक से कवर किया गया है या नहीं।
धारा 3(c) पर याचिकाकर्ता की आपत्ति
याचिकाकर्ता की ओर से वकील विष्णु शंकर जैन ने कहा कि यूजीसी नियमों की धारा 3(c) में सिर्फ एससी एसटी और ओबीसी की बात की गई है। इससे बाकी वर्ग बाहर हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि जब भेदभाव की परिभाषा पहले से मौजूद है तो अलग धारा बनाने की जरूरत क्या थी। उनके मुताबिक यह समाज में और विभाजन पैदा करता है।
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सामान्य वर्ग के छात्रों को लेकर उठे सवाल
एक अन्य वकील ने कहा कि अगर कोई सामान्य वर्ग का छात्र कॉलेज के पहले दिन रैगिंग का शिकार होता है तो उसके लिए नियमों में कोई साफ रास्ता नहीं है। उल्टा अगर उस पर ही भेदभाव का आरोप लग जाए तो उसका भविष्य खराब हो सकता है। इस पर सीजेआई ने पूछा कि रैगिंग को नए नियमों में शामिल क्यों नहीं किया गया।
केंद्र से जवाब और नियमों पर रोक
सुप्रीम कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल से पूछा कि जब भेदभाव की परिभाषा पहले से व्यापक है तो जाति आधारित भेदभाव को अलग से क्यों लिखा गया। कोर्ट ने कहा कि वह ऐसे नियम चाहता है जो सबके लिए बराबरी और न्याय सुनिश्चित करें। फिलहाल कोर्ट ने नए नियमों पर रोक लगाते हुए केंद्र से जवाब मांगा है।