आज भले ही भारत में क्रिकेट का दबदबा दिखता हो, लेकिन एक समय ऐसा था जब फुटबॉल देश के सबसे लोकप्रिय खेलों में शामिल था। 1911 में मोहन बागान ने अंग्रेजी टीम को हराकर इतिहास रचा था। 1950 में भारत फीफा वर्ल्ड कप के लिए क्वालिफाई भी कर चुका था। 1951 और 1962 एशियाई खेलों में गोल्ड मेडल और 1956 ओलंपिक में चौथा स्थान भारत की फुटबॉल ताकत का सबूत था।
1983 ने बदल दी खेल की तस्वीर
भारत में क्रिकेट की असली क्रांति 1983 वर्ल्ड कप जीत के बाद आई। कपिल देव की कप्तानी में मिली उस जीत ने पूरे देश को एक नया हीरो दिया। रंगीन टीवी का दौर शुरू हो रहा था और क्रिकेट घर-घर पहुंच गया। इसके बाद 1985 की बड़ी जीत और फिर सचिन तेंदुलकर जैसे सितारों ने क्रिकेट को लोगों के दिलों में हमेशा के लिए बसा दिया।
क्रिकेट खेलना आसान, फुटबॉल मुश्किल
क्रिकेट की लोकप्रियता का एक बड़ा कारण इसकी आसान पहुंच भी है। गली में तीन ईंटें, एक बल्ला और एक गेंद मिल जाए तो मैच शुरू हो जाता है। वहीं फुटबॉल के लिए बड़ा मैदान चाहिए। यही वजह है कि बचपन से ही ज्यादातर बच्चे क्रिकेट से जुड़ जाते हैं और उसी खेल के साथ उनका लगाव बढ़ता जाता है।
पैसा, मीडिया और स्टार पावर
1990 के दशक के बाद निजी टीवी चैनलों और विज्ञापन बाजार ने क्रिकेट को नई ऊंचाई दी। सचिन, धोनी, कोहली जैसे खिलाड़ियों ने करोड़ों लोगों को जोड़ा। बाद में IPL ने क्रिकेट को मनोरंजन और कारोबार दोनों का सबसे बड़ा मंच बना दिया। दूसरी तरफ फुटबॉल को उतना प्रसारण, पैसा और प्रचार नहीं मिला, जिससे उसका विकास धीमा रहा।
आंकड़े बताते हैं कितना बड़ा फर्क
रिपोर्ट्स के मुताबिक भारत में लगभग 55 से 57 करोड़ लोग क्रिकेट को फॉलो करते हैं। वहीं फुटबॉल के प्रशंसकों की संख्या करीब 7 से 8 करोड़ बताई जाती है। क्रिकेट की पहुंच गांव-गांव तक है, जबकि फुटबॉल अभी भी मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल, केरल, गोवा और पूर्वोत्तर राज्यों में ज्यादा लोकप्रिय है।
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फुटबॉल का भविष्य बेहतर दिख रहा
हालांकि तस्वीर धीरे-धीरे बदल रही है। युवा अब सोशल मीडिया पर मेसी और रोनाल्डो को देख रहे हैं। ISL ने भी फुटबॉल को नए शहरों तक पहुंचाया है। सुनील छेत्री, संदेश झिंगन और बाला देवी जैसे खिलाड़ियों ने नई पीढ़ी को प्रेरित किया है। फिर भी भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैच जैसी दीवानगी तक पहुंचने के लिए फुटबॉल को अभी लंबा सफर तय करना होगा।