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"लव एंड गॉड" : भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जो अपने बनने से ज़्यादा, बनने की प्रक्रिया के लिए जानी जाती हैं। "लव एंड गॉड" (Love and God) एक ऐसी ही फिल्म है, जिसे पूरा होने में करीब 20 साल का लंबा समय लग गया। यह फिल्म केवल एक प्रेम कहानी नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा के सबसे लंबे प्रोडक्शन में से एक का प्रतीक बन गई है. इस फिल्म का निर्देशन के. आसिफ ने किया, जो अपने जीवनकाल में ही 'मुगल-ए-आज़म' जैसी ऐतिहासिक फिल्म बना चुके थे. 'लव एंड गॉड' उनकी महत्वाकांक्षी परियोजना थी, जो फ़ारसी साहित्य की प्रसिद्ध प्रेम कहानी लैला-मजनूं पर आधारित थी. फिल्म में मुख्य भूमिकाओं के लिए शुरू में गुरुदत्त और निम्मी को चुना गया था.
फिल्म को बनने में 20 साल क्यों लगे?
1. गुरुदत्त की असमय मृत्यु:
फिल्म की शूटिंग 1960 के दशक की शुरुआत में शुरू हुई, लेकिन कुछ ही समय बाद गुरुदत्त का आकस्मिक निधन हो गया। इस एक घटना ने फिल्म की गति पर गहरा असर डाला और प्रोडक्शन रोकना पड़ा.
2. कास्ट में बदलाव:
गुरुदत्त की मृत्यु के बाद, निर्देशक के. आसिफ ने मजनूं की भूमिका के लिए संजय खान को चुना। इससे फिल्म को दोबारा कई हिस्सों में शूट करना पड़ा, जिससे समय और लागत दोनों बढ़े.
3. निर्देशक की मृत्यु:
जब फिल्म एक बार फिर अपने अंतिम चरण में पहुंचने लगी, तब 1971 में के. आसिफ का भी निधन हो गया। इस वजह से फिल्म अधूरी रह गई और फिर कई वर्षों तक ठंडी पड़ी रही.
4. फिल्म को पूरा करने की कोशिश:
के. आसिफ की मृत्यु के बाद, फिल्म को किसी तरह 1970 के दशक के अंत में फिर से शुरू किया गया। लेकिन यह कार्य आसान नहीं था क्योंकि निर्देशक की मूल दृष्टि के बिना कहानी को पूरा करना बहुत चुनौतीपूर्ण था.
5. तकनीकी सीमाएं और आर्थिक संकट:
उस समय की तकनीकी सीमाएं और बजट संबंधी समस्याओं ने भी फिल्म के निर्माण को धीमा कर दिया। इतने लंबे समय तक प्रोजेक्ट को जिंदा रखना अपने आप में एक कठिन काम था.
आखिरकार रिलीज़
कई सालों की देरी और संघर्षों के बाद, 'लव एंड गॉड' को 1986 में रिलीज़ किया गया। हालांकि यह फिल्म अधूरी लगती है और पूरी तरह से निर्देशक की मूल कल्पना को दर्शा नहीं पाई, फिर भी इसे एक ऐतिहासिक प्रयास माना जाता है। यह फिल्म निम्मी की आखिरी और के. आसिफ की अधूरी विरासत के रूप में जानी जाती है. 'लव एंड गॉड' केवल एक फिल्म नहीं थी, बल्कि एक सपना था जिसे समय, परिस्थितियों और किस्मत ने कई बार रोका। इस फिल्म की कहानी और निर्माण से यह सीख मिलती है कि फिल्में सिर्फ कैमरे से नहीं, बल्कि समय, धैर्य और जुनून से बनती हैं। 20 साल तक चलने वाला यह सफर, भारतीय सिनेमा की सबसे दिलचस्प कहानियों में से एक बन गया.