13 दिसंबर 2001 को भारतीय संसद पर हुआ आतंकी हमला सिर्फ एक सुरक्षा चूक नहीं, बल्कि भारत की संप्रभुता और लोकतंत्र पर सीधा प्रहार था। जवाब में भारत ने अभूतपूर्व सैन्य लामबंदी करते हुए ऑपरेशन पराक्रम शुरू किया। लाखों सैनिक सीमा पर तैनात हुए, माहौल युद्ध जैसा बन गया, लेकिन नौ महीने बाद बिना जंग लड़े सेना की वापसी हुई। सवाल यही है—जब सेना तैयार थी, तो कदम पीछे क्यों खींचे गए?
संसद हमला: लोकतंत्र पर सीधा वार
13 दिसंबर 2001 की सुबह आतंकियों ने फर्जी पहचान और वाहनों के जरिए संसद परिसर में घुसकर गोलीबारी की। इस हमले में सुरक्षाकर्मी और कर्मचारी शहीद हुए, हालांकि संसद के भीतर मौजूद शीर्ष नेता सुरक्षित रहे। हमलावरों को मौके पर ही मार गिराया गया, लेकिन इस घटना ने देश को झकझोर दिया। इसे भारत की राजनीतिक व्यवस्था और राष्ट्रीय आत्मसम्मान पर हमला माना गया।
ऑपरेशन पराक्रम: सीमा पर युद्ध जैसी स्थिति
हमले के तुरंत बाद भारत ने ऑपरेशन पराक्रम के तहत 5 से 8 लाख सैनिकों को सीमा और नियंत्रण रेखा पर तैनात किया। जवाब में पाकिस्तान ने भी बड़ी संख्या में सेना को मोर्चे पर लगाया। दशकों बाद पहली बार दोनों देशों की सेनाएं इतने लंबे समय तक आमने-सामने रहीं। यह सैन्य दबाव पाकिस्तान को आतंकवाद पर कार्रवाई के लिए मजबूर करने की रणनीति का हिस्सा था।
सरकार की रणनीति: दबाव या युद्ध?
सरकार के भीतर इस बात पर मंथन चलता रहा कि सीमित कार्रवाई की जाए या पूर्ण युद्ध। राजनीतिक नेतृत्व आतंकवाद के खिलाफ सख्त संदेश देना चाहता था, लेकिन युद्ध के स्पष्ट लक्ष्य और ‘एंड स्टेट’ तय नहीं हो पाए। वायुसेना और नौसेना जल्दी तैयार थीं, जबकि थलसेना की मुख्य आक्रामक इकाइयों को पूरी तरह तैयार होने में समय लग रहा था।
परमाणु साया और अंतरराष्ट्रीय दबाव
1998 के बाद दोनों देश परमाणु शक्ति बन चुके थे। सीमा पर तनाव बढ़ने के साथ परमाणु युद्ध की आशंका भी चर्चा में रही। यह डर था कि सीमित संघर्ष भी अनियंत्रित रूप से बड़े युद्ध में बदल सकता है। साथ ही, अंतरराष्ट्रीय दबाव और क्षेत्रीय स्थिरता के सवाल ने भारत को संयम बरतने की ओर धकेला।
वापसी का फैसला: सबक क्या मिला?
करीब नौ महीने तक चले इस सैन्य स्टैंडऑफ में भारी आर्थिक लागत और दुर्घटनाओं में सैनिकों की जान गई, लेकिन युद्ध नहीं हुआ। अंततः पाकिस्तान के आश्वासनों और कूटनीतिक दबाव के बाद सेना की वापसी का निर्णय लिया गया। ऑपरेशन पराक्रम ने भारत को यह सिखाया कि तेज, सीमित और निर्णायक सैन्य विकल्प कितने जरूरी हैं—यही सोच आगे चलकर नई रणनीतियों का आधार बनी।