भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगातार कमजोर होता जा रहा है और अब यह 92 के स्तर तक पहुंच गया है। यह रुपये का अब तक का सबसे निचला स्तर माना जा रहा है। ऐसे समय में यह गिरावट आई है जब दुनिया भर में अनिश्चितता बनी हुई है। जनवरी 2026 में ही रुपया करीब 2.3 फीसदी तक टूट चुका है। इससे आम लोगों से लेकर कारोबारियों तक की चिंता बढ़ गई है।
लगातार फिसलता रुपया क्या कहता है
पिछले कुछ समय से रुपये में मजबूती की जगह कमजोरी ही देखने को मिल रही है। हाल के कारोबारी सत्रों में रुपया 91.98 के आसपास तक पहुंच गया था। यह सितंबर 2022 के बाद से सबसे खराब मासिक प्रदर्शन माना जा रहा है। साफ है कि रुपये पर दबाव लंबे समय से बना हुआ है और फिलहाल राहत के संकेत कम दिख रहे हैं।
गिरावट की असली वजह क्या है
रुपये की कमजोरी के पीछे कई वजहें हैं। दुनिया में ट्रेड वॉर और टैरिफ जैसे मुद्दों ने माहौल खराब किया है। इसका असर उभरते बाजारों पर पड़ा है और विदेशी निवेश की रफ्तार धीमी हो गई है। वहीं अमेरिका जैसे देशों में ब्याज दरें ज्यादा होने से निवेशक वहां पैसा लगाने को प्राथमिकता दे रहे हैं। इससे भारत जैसे देशों की करेंसी पर दबाव बढ़ता है।
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चालू खाता घाटा भी बना कारण
भारत का चालू खाता घाटा भी रुपये पर बोझ बढ़ाता है। इसका मतलब है कि देश जितना निर्यात करता है उससे ज्यादा आयात करता है। इस अंतर को भरने के लिए विदेशी पूंजी जरूरी होती है। जब विदेशी पैसा कम आता है तो रुपये की कीमत गिरने लगती है और डॉलर के मुकाबले वह कमजोर हो जाता है।
आर्थिक सर्वे में क्या कहा गया
आर्थिक सर्वे के बाद प्रेस वार्ता में वी अनंत नागेश्वरन ने कहा कि रुपये की गिरावट सिर्फ भारत की समस्या नहीं है। जिन देशों का चालू खाता घाटा है वहां की मुद्राएं भी कमजोर हुई हैं। उन्होंने यह भी कहा कि लंबे समय में रुपया अब भी कई देशों की मुद्राओं से बेहतर स्थिति में रहा है।
कमजोर रुपये का आम लोगों पर असर
रुपये के कमजोर होने से सबसे बड़ा असर महंगाई पर पड़ता है। भारत कच्चे तेल का बड़ा आयातक है और जब रुपया गिरता है तो पेट्रोल डीजल महंगे होने का खतरा बढ़ जाता है। इसका असर ट्रांसपोर्ट से लेकर रोजमर्रा की चीजों पर पड़ता है। इसके अलावा विदेश में पढ़ाई करना और बाहर पैसा भेजना भी महंगा हो जाता है। ऐसे में साफ है कि रुपये की गिरावट सिर्फ आंकड़ों की बात नहीं बल्कि आम आदमी की जेब से भी जुड़ा मुद्दा है।