हिंदू धर्म में भगवान गणेश को प्रथम पूज्य देवता माना गया है। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत गणेश वंदना से की जाती है। गणपति बप्पा की पूजा में मोदक, सिंदूर और दूर्वा का विशेष महत्व बताया गया है। विशेष रूप से दूर्वा चढ़ाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार दूर्वा भगवान गणेश को अत्यंत प्रिय है और इसे अर्पित करने से भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इसके पीछे एक रोचक पौराणिक कथा भी प्रचलित है।
अनलासुर राक्षस से जुड़ी है कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार प्राचीन काल में अनलासुर नामक एक अत्यंत शक्तिशाली राक्षस था। उसके आतंक से देवता, ऋषि और मनुष्य सभी परेशान थे। कहा जाता है कि उसकी आंखों से अग्नि निकलती थी, जिससे चारों ओर विनाश फैलता था। जब सभी देवताओं ने भगवान गणेश से सहायता मांगी, तब गणेश जी ने अनलासुर का अंत करने का संकल्प लिया और उसे निगल लिया।
शरीर में बढ़ी असहनीय गर्मी
अनलासुर को निगलने के बाद भगवान गणेश के शरीर में अत्यधिक गर्मी उत्पन्न हो गई। इस गर्मी को शांत करने के लिए देवताओं ने कई उपाय किए। चंद्रमा को उनके मस्तक पर स्थापित किया गया, कमल के फूल अर्पित किए गए और अनेक शीतल वस्तुएं चढ़ाई गईं, लेकिन कोई भी उपाय पूरी तरह सफल नहीं हुआ। तब ऋषि-मुनियों ने दूर्वा घास का उपयोग करने का सुझाव दिया।
दूर्वा ने शांत की गणेश जी की पीड़ा
मान्यता है कि ऋषियों ने 21 गांठों वाली दूर्वा भगवान गणेश को अर्पित की। दूर्वा के स्पर्श से उनके शरीर की गर्मी शांत हो गई और उन्हें राहत मिली। तभी से दूर्वा गणेश जी को सबसे प्रिय अर्पणों में शामिल हो गई। यही कारण है कि गणेश पूजा में 21 दूर्वा चढ़ाने की परंपरा विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती है।
दूर्वा अर्पित करने का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गणेश जी को दूर्वा अर्पित करने से बुद्धि, सुख, समृद्धि और सफलता का आशीर्वाद प्राप्त होता है। यह नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने और जीवन में शुभता बढ़ाने का प्रतीक भी माना जाता है। गणेश चतुर्थी, संकष्टी चतुर्थी और बुधवार के दिन दूर्वा अर्पित करना विशेष फलदायी माना जाता है। यही वजह है कि आज भी गणेश भक्त श्रद्धा और विश्वास के साथ भगवान गणेश को दूर्वा अर्पित करते हैं और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने की कामना करते हैं।