देवताओं के बीच “नारायण-नारायण” का जाप करते हुए हर लोक में विचरण करने वाले Narada Muni हमेशा चलते ही क्यों रहते हैं? क्या यह सिर्फ उनकी प्रकृति है या इसके पीछे कोई गहरा रहस्य छुपा है? पौराणिक कथाओं के अनुसार, इसके पीछे दो श्रापों की कहानी जुड़ी है, जिसने उन्हें सदैव गतिशील रहने के लिए बाध्य कर दिया।
राजा दक्ष का श्राप: संतानों को मोक्ष मार्ग दिखाने की सजा
एक कथा के अनुसार, Narada Muni ने राजा दक्ष के हजारों पुत्रों को वैराग्य और मोक्ष का मार्ग दिखाया। इससे राजा का वंश आगे नहीं बढ़ सका। क्रोधित होकर Daksha ने नारद मुनि को श्राप दिया कि वे कभी एक स्थान पर नहीं टिक पाएंगे और सदा भटकते रहेंगे।
ब्रह्मा का श्राप: विवाह से इंकार बना कारण
दूसरी कथा के अनुसार, Brahma ने अपने पुत्र नारद से सृष्टि विस्तार के लिए विवाह करने को कहा। लेकिन नारद जी ने इसे अस्वीकार कर दिया। इससे क्रोधित होकर ब्रह्मा ने उन्हें श्राप दिया कि वे जीवनभर अविवाहित रहेंगे और हमेशा इधर-उधर घूमते रहेंगे।
तीनों लोकों में निरंतर भ्रमण
इन दोनों श्रापों के कारण Narada Muni का जीवन निरंतर यात्रा बन गया। वे स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल तीनों लोकों में विचरण करते हुए देवताओं, ऋषियों और दानवों के बीच संदेशवाहक की भूमिका निभाते हैं।
श्राप बना वरदान, बने देवर्षि नारद
दिलचस्प बात यह है कि यही श्राप आगे चलकर उनके लिए वरदान बन गया। निरंतर भ्रमण के कारण वे हर लोक की जानकारी रखने वाले देवर्षि बन गए और भगवान Vishnu के परम भक्त के रूप में प्रसिद्ध हुए।