पहली बात तो ये कि न्यूक्लियर बम सामान्य हथियारों की तरह बिकवाना-खरीदना संभव ही नहीं है. ये सिर्फ एक हथियार नहीं, ये सैंकड़ों हजार लोगों की जान और एक इलाके की मिट्टी, पानी और हवा को सालों तक बिगाड़ देने वाली मशीन है. इसलिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे अलग दर्जा मिला हुआ है .साधारण बंदूक या मिसाइल जहां खरीद-फरोख्त के बाजार में आ जाती है, वहां परमाणु हथियारों का कारोबार दुनिया की बुनियाद ही हिला देता है.
नियम और संधियां सबसे जरूरी
नियम और संधियां सबसे जरूरी, दरअसल 1970 की एनपीटी (न्यूक्लियर प्रॉस्पेरशन ट्रीटी) ने साफ कहा गया है कि जिन देशों के पास पहले से परमाणु हथियार नहीं थे, उन्हें इसे हासिल नहीं करने दिया जाएगा और जिनके पास हैं, उन्हें निरस्त्रीकरण की दिशा में काम करना चाहिए. 2017 की टीपीएनडब्ल्यू ने तो और भी आगे जाकर परमाणु हथियारों के निर्माण, टेस्ट, कब्जे और हस्तांतरण पर पूरी तरह रोक लगाने की कोशिश की. उसके अलावा सीटीबीटी मॉडल है जो सभी परमाणु विस्फोटों पर रोक लगाता है. इन संधियों के कारण किसी देश या किसी कारोबारी को खुले बाजार में परमाणु बम बेचने की कानूनी इजाज़त नहीं मिलती वरना गंभीर आर्थिक और राजनयिक सजा मिल सकती है.
तकनीकी और नैतिक बड़ा कारण
तीसरा कारण तकनीकी और नैतिक है. परमाणु हथियारों के साथ जुड़ी तकनीकें (जैसे समृद्ध यूरेनियम, प्लूटोनियम) बेहद संवेदनशील हैं इनके टुकड़े-दर-टुकड़े होकर भी रेडियोएक्टिव खतरों का कारण बनते हैं. इनके प्रसार से प्रॉलीफरेशन यानी कई राज्यों और गैर-राज्यिए समूहों के हाथ में ये अस्थिर करना आसान हो जाएगा और दुनिया में अस्थिरता का स्तर हजार गुना बढ़ जाएगा. इसलिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय में इन पर नर रखने के लिए जांच, निगरानी और दंड की सख्त व्यवस्था है जिससे इसे एक आम वाणिज्यिक वस्तु बनना मुमकिन ही नहीं.
न्यूक्लियर की खरीद-फरोख्त पर रोक
न्यूक्लियर हथियारों की खरीद-फरोख्त पर रोक सिर्फ कागजी नियम नहीं, बल्कि जरूरी सुरक्षा कवच है. ये नियम और संधियां बताती हैं कि ऐसी ताकतों को नियंत्रित करना ही मानवता की जरूरत है. जहां सामान्य हथियार नियंत्रित होकर भी बाज़ार में आते हैं, वहीं परमाणु हथियारों का बाजार होना दुनिया भर के लिए बहुत बड़ा रिस्क होगा इसलिए उन्हें खरीदना-बेचना नहीं, बल्कि घटाना और रोकना ही वैश्विक लक्ष्य है.