Indian Weather Report: देशभर में इस समय भीषण गर्मी का असर देखने को मिल रहा है। उत्तर और मध्य भारत के ऊपर बने हीट डोम के कारण तापमान लगातार बढ़ रहा है और लोगों को राहत नहीं मिल रही। मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि जून के तीसरे सप्ताह तक गर्मी का प्रकोप जारी रह सकता है। इसके बाद मानसून और प्री-मानसून बारिश से कुछ राहत मिल सकती है, लेकिन पूरे साल मौसम सामान्य रहने की उम्मीद कम दिखाई दे रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह अल नीनो को माना जा रहा है।
क्या है हीट डोम और क्यों बढ़ रही गर्मी?
विशेषज्ञों के मुताबिक उत्तर भारत के ऊपर इस समय हीट डोम जैसी स्थिति बनी हुई है। इसका मतलब है कि गर्म हवा एक जगह फंस गई है और बाहर नहीं निकल पा रही। इसी कारण दिल्ली, यूपी, राजस्थान और मध्य भारत के कई शहरों में तापमान लगातार रिकॉर्ड तोड़ रहा है। मौसम विभाग का अनुमान है कि मानसून केरल पहुंचने के बाद ही इस स्थिति में बदलाव शुरू होगा, लेकिन उत्तर भारत तक मानसून पहुंचने में अभी कई सप्ताह लग सकते हैं।
अल नीनो क्या है और क्यों बढ़ी चिंता?
वैज्ञानिक संस्थाओं का कहना है कि इस साल अल नीनो बनने की संभावना बहुत ज्यादा है। अल नीनो वह स्थिति होती है जब प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है। इसका सीधा असर भारत के मानसून पर पड़ता है। आमतौर पर अल नीनो के दौरान बारिश कम होती है और कई इलाकों में सूखे जैसी स्थिति बन सकती है। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार इस बार इसका असर लंबे समय तक रहने की आशंका है।
खेती और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है असर
भारत की बड़ी आबादी खेती पर निर्भर है और देश की आधे से ज्यादा खेती मानसून की बारिश पर टिकी हुई है। यदि बारिश कम हुई तो धान, गेहूं और गन्ने जैसी फसलों पर असर पड़ सकता है। कम बारिश से सिंचाई की समस्या बढ़ेगी, फसलों में रोग लगने का खतरा रहेगा और उत्पादन घट सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि कमजोर मानसून का असर खाद्य कीमतों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई दे सकता है।
किसान कैसे करें बचाव?
विशेषज्ञ किसानों को सलाह दे रहे हैं कि वे कम पानी वाली और जल्दी तैयार होने वाली फसलों की ओर ध्यान दें। ऐसी किस्मों का चयन करना बेहतर होगा जिनमें रोग प्रतिरोधक क्षमता ज्यादा हो। इसके अलावा ऑर्गेनिक खेती, ड्रिप सिंचाई और वैज्ञानिक खेती के तरीकों को अपनाने की भी सलाह दी जा रही है। मौसम की अनिश्चितता को देखते हुए किसान फलों और कम लागत वाली फसलों की खेती पर भी फोकस कर सकते हैं, ताकि नुकसान को कम किया जा सके।