तमिलनाडु में प्रस्तावित परिसीमन को लेकर मुख्यमंत्री एस. जोसेफ विजय की ओर से बुलाई गई सर्वदलीय सांसदों की बैठक राजनीतिक विवाद में घिर गई है। 8 अगस्त को आयोजित इस बैठक में राज्य के कुल 57 सांसदों में से केवल 20 सांसद ही पहुंचे, जबकि 37 सांसदों ने इसमें हिस्सा नहीं लिया। बैठक का उद्देश्य केंद्र की प्रस्तावित परिसीमन प्रक्रिया और इसके संभावित प्रभावों पर तमिलनाडु का रुख तय करना था। हालांकि, बड़ी संख्या में सांसदों की गैरमौजूदगी ने सरकार के सामने विपक्षी एकजुटता का सवाल खड़ा कर दिया है।
डीएमके समेत कई दलों ने बैठक से बनाई दूरी
बैठक में शामिल सांसदों में कांग्रेस के 12, वीसीके के 2, सीपीआई के 2, सीपीएम के 2, एमडीएमके का 1 और आईयूएमएल का 1 सांसद शामिल रहा। वहीं, डीएमके ने पहले ही अपने सांसदों को बैठक में नहीं भेजने का फैसला कर लिया था। इसके अलावा डीएमके के 30, एआईएडीएमके के 4, पीएमके, एमएनएम और डीएमडीके के एक-एक सांसद बैठक में शामिल नहीं हुए। राज्य के मुख्य सचिव एम. साई कुमार की ओर से 6 और 7 अगस्त को सांसदों को अलग-अलग निमंत्रण भेजे जाने के बावजूद बड़ी संख्या में सांसदों का अनुपस्थित रहना चर्चा का विषय बना हुआ है।
कावेरी विवाद को लेकर सरकार पर सवाल
बैठक का बहिष्कार करने वाले नेताओं का आरोप है कि सरकार परिसीमन के मुद्दे को आगे बढ़ाकर कावेरी जल विवाद जैसे अहम राज्य हित के विषयों से जनता का ध्यान हटाने की कोशिश कर रही है। कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच कावेरी नदी के पानी के बंटवारे का विवाद लंबे समय से चला आ रहा है। अब कर्नाटक की मेकेदातू परियोजना की योजना के कारण यह मुद्दा फिर प्रमुखता से सामने आया है। तमिलनाडु इसका विरोध कर रहा है। मुख्यमंत्री विजय ने विवाद के समाधान के लिए दोनों राज्यों के बीच बातचीत का सुझाव दिया था।
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डीएमके ने बताया बैठक को अनावश्यक
डीएमके की ओर से बैठक में शामिल नहीं होने के पीछे अलग राजनीतिक रुख अपनाया गया। पार्टी सूत्रों के अनुसार, डीएमके तभी चर्चा में शामिल होगी जब मेकेदातू मुद्दे पर सरकार औपचारिक रूप से सर्वदलीय बैठक बुलाएगी। पार्टी के एक सांसद ने तर्क दिया कि सरकार को पहले राजनीतिक दलों के शीर्ष नेतृत्व से संवाद करना चाहिए था। उनके मुताबिक सांसदों की भूमिका अपनी पार्टी के तय रुख को संसद में रखने की है, इसलिए केवल सांसदों की बैठक बुलाना उचित कदम नहीं था।
कांग्रेस ने परिसीमन का विरोध करने का ऐलान किया
कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम ने बैठक के बाद कहा कि तमिलनाडु के हितों की रक्षा को लेकर उपस्थित सांसदों में व्यापक सहमति रही। उन्होंने स्पष्ट किया कि राज्य संसद में अपने मौजूदा प्रतिनिधित्व को कम किए जाने का विरोध करेगा। कांग्रेस की मांग है कि लोकसभा की कुल सदस्य संख्या 543 पर कायम रहे और तमिलनाडु के हिस्से में मौजूदा 39 सीटें बरकरार रहें। उनका कहना है कि जनसंख्या या किसी अन्य आधार पर सीटों में ऐसा बदलाव नहीं होना चाहिए जिससे तमिलनाडु का राजनीतिक प्रतिनिधित्व घटे। इस मुद्दे पर राज्य की राजनीति में आगे भी टकराव बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं।