Earth Species Project: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल पूरी दुनिया में काफी तेजी से बढ़ा है। सामान्य इंटरनेट यूज़र्स से लेकर दुनिया की दिग्गज टेक कंपनियां तक अपने रोज़मर्रा के कामों और बिज़नेस में एआई का धड़ल्ले से इस्तेमाल कर रही हैं। हाल ही में आई एक नई रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि अब एआई का इस्तेमाल जानवरों की भाषा समझने के लिए किया जा रहा है।
एआई जानवरों की आवाज को करेगा डिकोड
माना जा रहा है कि आने वाले समय में एआई की मदद से इंसान बेज़ुबान जानवरों के हाव-भाव, उनके नेचर और उनकी आवाज़ों को आसानी से डिकोड कर सकेगा। हालांकि इस टेक्नोलॉजी के साथ कुछ खतरे भी सामने आ रहे हैं।
कई हज़ार घटों की ऑडियो रिकॉर्डिंग की
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार स्पेन के जीवविज्ञानी विट्टोरियो बाग्लियोनी ने क़रीब 43 कैरियर कौओं पर छोटे माइक्रोफ़ोन लगाकर कई हजार घटों की ऑडियो रिकॉर्डिंग की। उन्होंने अपनी रिसर्च साल 2018 में शुरू की थी। माइक्रोफ़ोन लगाने के बाद उन्हें कई हज़ार घंटों की रिकॉर्डिंग तो मिल गई, लेकिन अब सवाल ये था कि उन्हें चेक कौन करेगा।इतने बड़े डेटा को चेक करना काफ़ी मुश्किल काम था। इसलिए उन्होंने एआई का रास्ता चुना।
एआई ने की मदद
इंसानों के लिए 1.5 लाख से अधिक रिकॉर्डिंग्स को सुनना और विश्लेषण करना काफ़ी मुश्किल काम था। इसके लिए Earth Species Project के मशीन-लर्निंग मॉडल का इस्तेमाल किया गया, जिसने पक्षियों की अलग-अलग आवाजों को बहुत तेजी से छांटकर अलग किया।
रिसर्च में सामने आई ये बात
रिसर्च में सामने आया कि जब किसी शिकारी पक्षी ने कौए पर हमला किया, तो कौए ने एक विशेष धीमी आवाज़ निकाली। यह संकेत सुनते ही अन्य कौए तुरंत मदद के लिए आ पहुंचे। यानि एआई ने यह समझने में मदद की कि कौए ख़तरे के समय अपने साथियों को विशेष संकेत देकर बुलाते हैं।
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जीवों को पहुंच सकता है नुक़सान
वहीं न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं और अन्य वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि इस तकनीक का ग़लत इस्तेमाल जीवों को नुक़सान पहुंचा सकता है। अगर जानवरों या पक्षियों की रिकॉर्ड की गई आवाज़ों को बार-बार उनके सामने बजाया जाए, तो वे भ्रमित हो सकते हैं या भारी तनाव में आ सकते हैं।