पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ रहा एविएशन सेक्टर अब नई चुनौतियों का सामना कर रहा है। ईरान और अमेरिका के बीच बढ़े तनाव का असर वैश्विक स्तर पर कई उद्योगों पर पड़ रहा है और विमानन क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं है। ईंधन की बढ़ती कीमतों, परिचालन लागत में इजाफे और यात्रियों की संख्या में कमी के कारण कई एयरलाइंस अपनी उड़ानों में कटौती कर रही हैं।
कई शहरों में सीटें हुईं कम
एविएशन क्षेत्र के आंकड़ों के अनुसार देश के कई प्रमुख हवाई अड्डों पर उपलब्ध सीटों की संख्या में कमी दर्ज की गई है। हैदराबाद में सबसे ज्यादा गिरावट देखने को मिली, जहां सीट क्षमता में करीब 12 प्रतिशत की कमी आई है। चेन्नई में 8 प्रतिशत गिरावट दर्ज हुई, जबकि अहमदाबाद, मुंबई और कोलकाता में भी सीटों की संख्या घटी है। इससे यह संकेत मिलता है कि एयरलाइंस मांग और लागत के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही हैं।
दिल्ली और पुणे में बढ़ी गतिविधि
जहां कुछ शहरों में गिरावट देखी गई, वहीं दिल्ली और पुणे जैसे शहरों में उड़ानों और सीटों की संख्या में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। दिल्ली में करीब 9.6 प्रतिशत और पुणे में 6 प्रतिशत की वृद्धि बताई जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन शहरों में व्यावसायिक और घरेलू यात्रा की मांग अभी भी मजबूत बनी हुई है, जिसके चलते एयरलाइंस यहां अपनी सेवाएं बढ़ा रही हैं।
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महंगा हुआ विमान ईंधन
एयरलाइंस की सबसे बड़ी चिंता विमान ईंधन यानी एटीएफ की बढ़ती कीमतें हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ईंधन की कीमतों में तेज उछाल आया है, जिससे परिचालन खर्च काफी बढ़ गया है। बढ़ती लागत का असर टिकट कीमतों पर भी पड़ा है। कई रूटों पर किराया बढ़ने से यात्री वैकल्पिक साधनों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे उड़ानों की मांग प्रभावित हो रही है।
यात्रियों की संख्या में भी असर
जब टिकट महंगे होते हैं तो यात्रियों की संख्या में कमी आना स्वाभाविक माना जाता है। यही स्थिति कई घरेलू और अंतरराष्ट्रीय रूटों पर देखने को मिल रही है। कम यात्रियों के कारण एयरलाइंस को कई उड़ानों का संचालन आर्थिक रूप से लाभदायक नहीं लग रहा, जिसके चलते कुछ रूटों पर सेवाएं सीमित की जा रही हैं। इससे विमानन कंपनियों के राजस्व पर भी असर पड़ रहा है।
आगे क्या हो सकता है
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक हालात जल्द सामान्य नहीं हुए और ईंधन की कीमतें ऊंची बनी रहीं, तो आने वाले महीनों में एयरलाइंस पर दबाव और बढ़ सकता है। हालांकि उद्योग को उम्मीद है कि अंतरराष्ट्रीय स्थिति में सुधार होने पर लागत घटेगी और यात्रियों का भरोसा लौटेगा। फिलहाल एविएशन सेक्टर चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहा है और कंपनियां खर्च नियंत्रित करने के लिए उड़ानों के संचालन में बदलाव कर रही हैं।