लोकसभा में वंदे मातरम पर चल रही सामान्य चर्चा उस वक्त पूरी तरह बदल गई, जब समाजवादी पार्टी अध्यक्ष और कन्नौज सांसद अखिलेश यादव बोलने के लिए खड़े हुए। शुरुआत में ही उन्होंने ऐसा राजनीतिक तीर चलाया कि सत्ता पक्ष की बेंचों पर सन्नाटा छा गया। अखिलेश ने कहा कि वंदे मातरम सिर्फ गीत नहीं, बल्कि आजादी की लड़ाई की ऊर्जा है, जिसने देश को जोड़ा था। लेकिन आज इसे राजनीति का औजार बनाकर उसका अर्थ बदला जा रहा है। उनकी बातों से सदन का माहौल पलभर में तेज हो गया और पूरा ध्यान उनके भाषण पर टिक गया।
इतिहास और राष्ट्रवाद पर सधे तंज
अपनी बात रखते हुए अखिलेश ने इतिहास का मुद्दा उठाया और कहा कि जो लोग आज राष्ट्रवाद की सबसे ज्यादा बातें करते हैं, वे स्वतंत्रता आंदोलन में कहीं दिखाई नहीं दिए। उन्होंने तंज करते हुए कहा कि इतिहास खंगालिए कि आजादी के बाद कुछ संगठनों ने तिरंगा क्यों नहीं अपनाया और अलग गीत क्यों बनाया। अखिलेश ने इशारों में कहा कि राष्ट्रवाद दिखावे से नहीं, बल्कि त्याग और आचरण से आता है। इस तंज के बाद सत्ता पक्ष की बेंचों में हलचल दिखी, लेकिन अखिलेश बिना रुके अपनी बात आगे बढ़ाते रहे।
PDA का दम और वंदे मातरम का मूल संदेश
बहस के दौरान अखिलेश ने अयोध्या से सपा सांसद अवधेश प्रसाद का हाथ उठाकर PDA की ताकत भी दिखा दी। सदन में जोरदार प्रतिक्रियाएं सुनाई दीं। अखिलेश ने कहा कि वंदे मातरम का संदेश नफरत का नहीं, बल्कि एकता का है। अंग्रेजों ने इसे बैन किया, फिर भी लोगों ने इसे दिल में रखा। लेकिन आज इसे बहस और राजनीति का हथियार बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम पढ़ने का नहीं, निभाने का विषय है, और इसकी मूल भावना लोगों को जोड़ने की है, न कि बांटने की।
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राष्ट्रवाद और राजनीति पर आखिरी चोट
अखिलेश ने अपने भाषण के अंत में कहा कि कई महान परंपराएं और विचार ऐसे हैं जिनसे सत्ता पक्ष का वैचारिक रिश्ता नहीं रहा, फिर भी उन्हें राजनीतिक प्रचार में इस्तेमाल किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि असली राष्ट्रवाद शिक्षा, समानता और समाज सुधार में दिखता है, न कि नारों में। उन्होंने व्यंग्य करते हुए कहा कि जो लोग स्वतंत्रता संग्राम में नहीं थे, वे आज दूसरों को राष्ट्रभक्ति सिखाने की कोशिश कर रहे हैं।