सोशल मीडिया पर इन दिनों 'कॉकरोच जनता पार्टी' की चर्चा तेज है, लेकिन भारतीय राजनीति में जानवरों और उनके प्रतीकों का इतिहास काफी पुराना रहा है। देश की कई बड़ी पार्टियों ने पशु प्रतीकों के सहारे अपनी अलग पहचान बनाई। सबसे बड़ा उदाहरण बहुजन समाज पार्टी का है, जिसका चुनाव चिह्न हाथी है। यह केवल एक निशान नहीं बल्कि एक बड़े सामाजिक और राजनीतिक संदेश का प्रतीक बन गया।
शेर भी बना राजनीति की पहचान
हाथी के अलावा शेर भी भारतीय राजनीति में लंबे समय से मौजूद रहा है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस से जुड़ी पार्टी ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक ने शेर को अपना चुनाव चिन्ह बनाया। पार्टी आज भी इसी प्रतीक के साथ चुनावी मैदान में उतरती है। यह प्रतीक ताकत और आक्रामकता की पहचान माना गया।
कांग्रेस का बैलों से रिश्ता
आजादी के शुरुआती दौर में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का चुनाव चिन्ह दो बैल हुआ करता था। यह उस समय के किसान और ग्रामीण भारत की तस्वीर माना जाता था। बाद में पार्टी में विभाजन हुआ तो इंदिरा गांधी वाले गुट को गाय और बछड़ा चुनाव चिन्ह मिला। उस दौर में यह प्रतीक काफी चर्चा में रहा और भावनात्मक असर भी छोड़ गया।
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दक्षिण भारत में मुर्गे की एंट्री
दक्षिण भारतीय राजनीति में भी जानवरों के प्रतीकों का इस्तेमाल हुआ। तमिलनाडु की राजनीति में एक समय मुर्गा भी चुनाव चिन्ह के रूप में दिखाई दिया। बाद में राजनीतिक बदलावों और चुनाव आयोग के नियमों के कारण कई पार्टियों ने अपने प्रतीक बदल लिए। इससे साफ हुआ कि उस समय चुनाव चिह्नों को लेकर नियम अपेक्षाकृत आसान थे।
अब नए जानवरों पर रोक
समय के साथ चुनाव आयोग ने नियम बदल दिए। चुनाव प्रचार के दौरान असली जानवरों के इस्तेमाल और उनके साथ कथित क्रूरता की शिकायतों के बाद नए दलों को जानवर आधारित चुनाव चिन्ह देने पर रोक लगा दी गई। हालांकि पुराने दलों को पहले से मिले प्रतीकों पर छूट बनी हुई है। इसलिए सोशल मीडिया पर भले कॉकरोच पार्टी ट्रेंड कर रही हो, लेकिन भारतीय चुनावी राजनीति में अब किसी नए जानवर की एंट्री लगभग बंद मानी जा रही है।