मई 2026 में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में तीन बार बदलाव हुआ। 15 मई, 19 मई और 23 मई को हुई बढ़ोतरी के बाद पेट्रोल करीब 4.74 रुपये और डीजल 4.82 रुपये प्रति लीटर महंगा हुआ। लेकिन इससे पहले होर्मुज संकट के बाद 76 दिनों तक दाम स्थिर रखे गए थे। इस दौरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ीं, फिर भी उपभोक्ताओं पर तुरंत बोझ नहीं डाला गया।
सरकार और कंपनियों ने उठाया दबाव
सरकारी दावों के अनुसार तेल कंपनियां इस दौरान रोजाना भारी घाटा झेलती रहीं। केंद्र सरकार ने मार्च में एक्साइज ड्यूटी में कटौती कर राहत देने की कोशिश की। सरकार का तर्क है कि राजस्व का नुकसान खुद उठाया गया ताकि उपभोक्ताओं पर तुरंत असर न पड़े। साथ ही घरेलू आपूर्ति बनाए रखने के लिए कुछ अतिरिक्त उपाय भी किए गए।
दुनिया के मुकाबले भारत की स्थिति
आंकड़ों के अनुसार कई देशों में ईंधन की कीमतों में बड़ी बढ़ोतरी दर्ज हुई। कुछ देशों में पेट्रोल की कीमतें 40 से 90 प्रतिशत तक बढ़ीं, जबकि भारत में बढ़ोतरी लगभग 5 प्रतिशत के आसपास रही। सरकार का दावा है कि बड़े तेल उत्पादक देशों को छोड़ दें तो भारत में वृद्धि अपेक्षाकृत कम रही।
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राज्यों में दाम अलग क्यों
देशभर में पेट्रोल की कीमतें समान नहीं होतीं। इसकी वजह राज्यों द्वारा लगाया जाने वाला अलग-अलग वैट और अन्य शुल्क हैं। केंद्र की एक्साइज ड्यूटी पूरे देश में समान होती है, लेकिन राज्यों की कर व्यवस्था अलग होने से अंतिम कीमत बदल जाती है। इसी कारण कुछ राज्यों में पेट्रोल 115 रुपये से ऊपर और कुछ में करीब 100 रुपये के आसपास है।
2014 वाले पेट्रोल पर बहस
पेट्रोल की कीमतों को लेकर पुराने और नए दौर की तुलना भी चर्चा में है। एक पक्ष 2014 की कीमतों का हवाला देता है, जबकि दूसरा पक्ष ऑयल बॉन्ड और आर्थिक बोझ का तर्क रखता है। सरकार का कहना है कि पहले की कम कीमतों का भुगतान बाद के वर्षों में करना पड़ा।
महंगाई पर क्या असर होगा
ईंधन कीमतों का असर सिर्फ वाहन खर्च तक सीमित नहीं रहता। परिवहन लागत बढ़ने से रोजमर्रा की चीजों की कीमतें भी प्रभावित हो सकती हैं। आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार की स्थिति और घरेलू नीतियों पर लोगों की नजर बनी रहेगी।