
कहते हैं बिहार की मिट्टी में मेहनत की महक है, लेकिन इसी मिट्टी ने वो दौर भी देखा जब बंदूक की आवाज सत्ता की पहचान बन गई थी. आजादी के बाद से लेकर 2025 तक बिहार की राजनीति पर बाहुबलियों का ऐसा साया छाया रहा जिसने अपराध और लोकतंत्र के बीच की लकीर मिटा दी. कामदेव सिंह से लेकर मोहम्मद शहाबुद्दीन और अनंत सिंह तक हर बाहुबली ने सत्ता को अपने दम और डर से झुकाया. ये वो नेता बने जिन्होंने बंदूक से बूथ जीते और फिर उसी ताकत से विधायक और सांसद की कुर्सी पर बैठ गए.
अपराध बना राजनीति का शॉर्टकट
आजादी के तुरंत बाद बिहार में जातीय संघर्षों ने अपराध को जन्म दिया. बेगूसराय के कामदेव सिंह को बिहार का पहला डॉन कहा गया, जिसने बूथ कैप्चरिंग से लेकर नेताओं को जिताने तक का पूरा तंत्र खड़ा किया. 70 और 80 के दशक में सूरजभान सिंह, छोटन शुक्ला, पप्पू यादव और आनंद मोहन जैसे बाहुबली उभरे जिन्होंने राजनीति में प्रवेश किया और अपनी बंदूकों को वोट की ताकत बना दिया. 1990 के दशक में तो हालात इतने बिगड़े कि सिवान के शहाबुद्दीन का नाम सुनते ही लोगों में खौफ फैल जाता था. कहा जाता है कि तब बिहार में कानून नहीं, जात और गन का राज चलता था.
सुशासन का दौर, लेकिन परछाइयां बाकी
2005 में नीतीश कुमार के आने के बाद कानून व्यवस्था पर सख्ती बढ़ी. एक-एक कर पुराने बाहुबली या तो जेल गए या राजनीति से बाहर हुए. शहाबुद्दीन को गिरफ्तार किया गया, आनंद मोहन को उम्रकैद मिली, और सूरजभान सिंह पर सजा हुई लेकिन बाहुबली राजनीति से पूरी तरह गायब नहीं हुए कुछ जेल से ही चुनाव जीतते रहे, तो कुछ अपने परिवार को राजनीति में उतारते गए. अनंत सिंह और पप्पू यादव जैसे नाम फिर से विधानसभा और संसद में दिखने लगे. बाहुबल का रंग अब बदल गया, वो अपहरण और हत्या से निकलकर सैंड माफिया और साइबर क्राइम तक पहुंच गया.
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2025 में भी सवाल वही, क्या बिहार बदलेगा?
2020 के चुनावों में अनंत सिंह ने आरजेडी टिकट पर जीत दर्ज की, जबकि आनंद मोहन की जेल से रिहाई ने एक बार फिर बिहार की सियासत को गरमा दिया. सूरजभान सिंह की पत्नी और पप्पू यादव जैसे चेहरे अब भी मैदान में हैं. सवाल यही है क्या बिहार अब बाहुबल से ऊपर उठ पाएगा? क्या अब बंदूक की जगह विकास बोलेगा? बिहार का इतिहास बताता है कि जब कानून कमजोर पड़ता है, तो अपराधी नेता बन जाते हैं. लेकिन आज भी वक्त है, जब बिहार उस डर की राजनीति से बाहर निकलकर नई सोच और साफ सियासत की राह चुन सकता है क्योंकि बिहार की जनता अब डर नहीं, बदलाव चाहती है.