बिहार की पांच राज्यसभा सीटों पर 16 मार्च को चुनाव होना है। अप्रैल में ये सीटें खाली हो रही हैं। अभी इनमें से तीन सीटें एनडीए के पास हैं और दो आरजेडी के पास। लेकिन विधानसभा का बदला हुआ गणित इस बार पूरी तस्वीर बदल रहा है। सभी दल अपने-अपने हिसाब से रणनीति बना रहे हैं और उम्मीदवारों के नाम पर मंथन तेज हो गया है।
कुशवाहा की वापसी मुश्किल
राष्ट्रीय लोक मोर्चा के नेता उपेंद्र कुशवाहा का कार्यकाल खत्म हो रहा है। लेकिन इस बार उनका दोबारा राज्यसभा पहुंचना लगभग नामुमकिन माना जा रहा है। राज्यसभा चुनाव जीतने के लिए 41 विधायकों के वोट चाहिए, जबकि उनकी पार्टी के पास सिर्फ चार विधायक हैं। ऐसे में वे अपने दम पर चुनाव नहीं जीत सकते। अगर जेडीयू या बीजेपी उन्हें अपने कोटे से भेजे तो बात बन सकती है, लेकिन फिलहाल ऐसी संभावना कमजोर दिख रही है।
आरजेडी की भी बढ़ी चिंता
आरजेडी के दो सांसदों का कार्यकाल भी खत्म हो रहा है। पहले के मुकाबले अब पार्टी के पास विधानसभा में कम विधायक हैं। ऐसे में दोनों सीटें बचाना उसके लिए आसान नहीं होगा। जीत के लिए उसे महागठबंधन के साथ-साथ अन्य दलों और निर्दलीय विधायकों का भी समर्थन चाहिए। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि इस बार आरजेडी को नुकसान उठाना पड़ सकता है।
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एनडीए की रणनीति और नए चेहरे
विधानसभा में संख्या बल के आधार पर एनडीए का पलड़ा भारी माना जा रहा है। चार सीटें तो वह आराम से जीत सकता है और पांचवीं पर भी नजर है। बीजेपी इस बार जातीय संतुलन और लोकप्रिय चेहरों पर ध्यान दे रही है। चर्चा है कि भोजपुरी गायक और अभिनेता पवन सिंह को राज्यसभा भेजा जा सकता है। उनके अलावा संजय मायुख और किसी बड़े सामाजिक चेहरे का नाम भी चर्चा में है।
जेडीयू और चिराग का गणित
जेडीयू अपने कोटे से दो सीटें जीत सकती है। रामनाथ ठाकुर का नाम लगभग तय माना जा रहा है। हरिवंश नारायण सिंह को लेकर संशय है और पार्टी नए चेहरे पर भी दांव लगा सकती है। वहीं चिराग पासवान भी अपनी तरफ से एक सीट चाहते हैं। उनकी मां रीना पासवान का नाम चर्चा में है, लेकिन इसके लिए अतिरिक्त समर्थन की जरूरत होगी।
पांचवीं सीट पर असली खेल
सबसे ज्यादा नजर पांचवीं सीट पर है। यहां एनडीए को अतिरिक्त समर्थन चाहिए होगा। AIMIM और निर्दलीय विधायकों की भूमिका अहम हो सकती है। अगर विपक्ष एकजुट हुआ तो मुकाबला कड़ा हो सकता है। कुल मिलाकर इस बार बिहार का राज्यसभा चुनाव सीधा नहीं, बल्कि जोड़-तोड़ और रणनीति का खेल बन गया है। अब देखना होगा कि आखिरी वक्त पर किसकी लॉटरी लगती है।