भारतीय जनता पार्टी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने मंगलवार को पद संभालते ही काम की रफ्तार तेज कर दी। पहले ही दिन उन्होंने केरल विधानसभा और कुछ नगर निगम चुनावों के लिए प्रभारियों और सह प्रभारियों की नियुक्ति कर दी। इसके साथ ही उन्होंने प्रदेश अध्यक्षों संगठन महासचिवों और राज्य प्रभारियों के साथ दिन भर बैठकों में हिस्सा लिया। साफ संकेत है कि पार्टी संगठन को लेकर वह शुरुआत से ही पूरी तरह सक्रिय हैं।
बिहार सत्र को लेकर उठे सवाल
नितिन नवीन को लेकर सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वह फरवरी से शुरू हो रहे बिहार विधानसभा के बजट सत्र में शामिल होंगे। उन्होंने भले ही नीतीश सरकार में मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया हो लेकिन वह अब भी बांकीपुर सीट से बीजेपी विधायक हैं। विधायक रहने के कारण विधानसभा की कार्यवाही में शामिल होना उनकी जिम्मेदारी है। ऐसे में दिल्ली और पटना के बीच उनकी भूमिका को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
राज्यसभा का विकल्प खुला लेकिन फिलहाल दूरी
पार्टी के पास नितिन नवीन को राज्यसभा भेजने का आसान रास्ता मौजूद है। अप्रैल में बिहार से राज्यसभा की पांच सीटें खाली हो रही हैं और गणित एनडीए के पक्ष में है। चार सीटों पर एनडीए की जीत लगभग तय मानी जा रही है। इसके बावजूद पार्टी सूत्रों का कहना है कि फिलहाल उन्हें राज्यसभा भेजने का इरादा नहीं है ताकि उनका बिहार से सीधा जुड़ाव बना रहे।
अमित शाह का उदाहरण क्यों दिया जा रहा
बीजेपी के अंदर नितिन नवीन की स्थिति की तुलना अमित शाह से की जा रही है। अमित शाह भी राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद लंबे समय तक विधायक बने रहे थे। उन्होंने गुजरात विधानसभा की कार्यवाही में हिस्सा लिया और बाद में राज्यसभा पहुंचे। पार्टी का मानना है कि संगठन प्रमुख का जमीन से जुड़ा रहना कई बार रणनीतिक रूप से जरूरी होता है।
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बिहार की राजनीति में नवीन की भूमिका
पार्टी नेताओं का कहना है कि बिहार में फिलहाल एनडीए की स्थिति मजबूत है। हालांकि बीजेपी और जेडीयू के बीच तालमेल हमेशा चर्चा में रहता है लेकिन नीतीश कुमार के पाला बदलने की संभावना कम मानी जा रही है। नितिन नवीन को विधायक बनाए रखने के पीछे यह सोच भी है कि पार्टी की नजर बिहार की सियासत पर लगातार बनी रहे।
2029 तक की बड़ी तैयारी का संकेत
पार्टी सूत्रों के मुताबिक नितिन नवीन की अगुवाई में बीजेपी 2029 का लोकसभा चुनाव भी लड़ेगी। इस साल राज्यसभा की 71 सीटों पर चुनाव होने हैं और बीजेपी की संख्या और बढ़ सकती है। पश्चिम बंगाल तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में होने वाले बदलाव भी अहम हैं। कुल मिलाकर नितिन नवीन की भूमिका सिर्फ संगठन प्रमुख तक सीमित नहीं बल्कि भविष्य की बड़ी रणनीति से जुड़ी मानी जा रही है।