उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर वही पुराना सवाल केंद्र में आ गया है कि सत्ता की चाबी किसके हाथ में होगी। लखनऊ में अपने 70वें जन्मदिन के मौके पर मायावती ने ऐसा बयान दिया, जिसने सत्ताधारी दल से लेकर विपक्ष तक हलचल मचा दी। प्रेस वार्ता में मायावती ने सीधे ब्राह्मण समाज का नाम लिया और भाजपा, सपा और कांग्रेस पर एक साथ सवाल खड़े कर दिए। उनका इशारा साफ था कि सवर्ण समाज, खासकर ब्राह्मणों के भीतर जो असंतोष है, उसे अब नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यही बयान यूपी की सियासत में नई बहस की शुरुआत बन गया।
बैठकों के जिक्र से दिया बड़ा राजनीतिक संकेत
मायावती ने कहा कि हाल के दिनों में ब्राह्मण विधायकों की बैठक हुई, जिसमें उपेक्षा की बात सामने आई। उन्होंने क्षत्रिय समाज के विधायकों की बैठकों का जिक्र कर यह भी साफ किया कि सवर्ण समाज के भीतर बेचैनी अब खुलकर दिख रही है। इसी के साथ सियासी गलियारों में चर्चा शुरू हो गई कि मायावती ने यह मुद्दा अभी क्यों उठाया। जानकारों का मानना है कि यह पूरा संकेत सीधे 2027 विधानसभा चुनाव से जुड़ा है। मायावती ने बिना नाम लिए यह जता दिया कि आने वाले समय में सवर्ण समाज की नाराजगी चुनावी नतीजों को पलट सकती है।
बाटी-चोखा शब्द और ब्राह्मण गणित
मायावती के बयान में सबसे ज्यादा चर्चा जिस शब्द की हुई, वह था बाटी-चोखा। उन्होंने ब्राह्मण समाज से कहा कि सम्मान के नाम पर दिखावे की राजनीति को पहचानें और किसी के बहकावे में न आएं। उनका दावा था कि बसपा सरकार में ब्राह्मणों को हमेशा प्रतिनिधित्व मिला और आगे भी मिलेगा। आंकड़ों की बात करें तो उत्तर प्रदेश की आबादी में ब्राह्मण समाज की हिस्सेदारी करीब 10 से 11 प्रतिशत मानी जाती है। संख्या भले कम हो, लेकिन शहरी और अर्ध-शहरी सीटों पर यही वर्ग सरकार बनाने और बिगाड़ने में निर्णायक भूमिका निभाता रहा है। यही वजह है कि हर दल की नजर इस वोट बैंक पर टिकी रहती है।
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पुराने बयानों का असर और 2027 की तैयारी
पिछले कुछ महीनों में बृजभूषण शरण सिंह के बयान ने भी ब्राह्मण समाज को लेकर बहस छेड़ी थी, जिससे भाजपा के भीतर बेचैनी बढ़ी। वहीं केंद्र में मंत्री पंकज चौधरी को लेकर भी यह चर्चा रही कि ब्राह्मणों की नाराजगी भाजपा के लिए नुकसानदेह हो सकती है। ऐसे माहौल में मायावती का यह बयान सियासी दांव माना जा रहा है। उन्होंने साफ कहा कि गठबंधन से पार्टी को नुकसान हुआ, इसलिए आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनाव बसपा अकेले लड़ेगी। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यह बयान सिर्फ जन्मदिन की औपचारिकता नहीं, बल्कि 2027 से पहले ब्राह्मण समाज को साधने की रणनीति है। अब देखना यही है कि यह दांव सियासी ब्रह्मास्त्र बनता है या सिर्फ चर्चा तक सीमित रहता है।