डोनाल्ड ट्रंप रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर दबाव बना रहे हैं। उन्होंने मॉस्को पर नए प्रतिबंध लगाए और ऐसे देशों को भारी टैरिफ लगाने की चेतावनी दी। भारत पर भी अतिरिक्त टैरिफ की घोषणा हुई थी, हालांकि बाद में इसे वापस ले लिया गया। हाल के महीनों में भारत ने रूस से तेल खरीद कुछ कम कर दी है। लेकिन इसी दौरान चीन ने उल्टा कदम उठाते हुए रूस से कच्चे तेल की खरीद बढ़ा दी है, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार में नई हलचल दिख रही है।
धमकी के बावजूद चीन की रिकॉर्ड खरीद
अमेरिकी दबाव के बावजूद चीन रूस से रिकॉर्ड मात्रा में कच्चा तेल खरीद रहा है। शुरुआती आकलनों के अनुसार फरवरी में रूस से चीन को रोजाना करीब 2 मिलियन बैरल से ज्यादा तेल भेजा गया, जो जनवरी से काफी अधिक है। खासकर निजी रिफाइनर सस्ते तेल का जमकर फायदा उठा रहे हैं। ऊर्जा डेटा फर्म वोरटेक्स एनालिटिक्स और केप्लर के आंकड़े भी इस तेजी की पुष्टि करते हैं। इससे साफ है कि चीन अपनी ऊर्जा जरूरतों और भंडार को मजबूत करने में लगा है।
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भारत ने घटाई रूसी तेल की खरीद
जहां चीन आयात बढ़ा रहा है, वहीं भारत ने रूसी कच्चे तेल की खरीद में कमी की है। फरवरी में भारत का आयात घटकर करीब 1.15 मिलियन बैरल प्रतिदिन रह गया। बताया जा रहा है कि पश्चिमी देशों के दबाव और व्यापारिक समीकरणों के कारण भारत ने यह कदम उठाया। पिछले दो वर्षों में पहली बार नवंबर के बाद से भारत ने रूस से तेल खरीद में उल्लेखनीय कमी दर्ज की थी। इसके उलट, चीन लगातार रूस का सबसे बड़ा खरीदार बनकर उभरा है।
रणनीति, कीमत और वैश्विक असर
रूसी तेल की कीमतों में नरमी आने से चीन को सस्ते आयात का मौका मिला, जिसे उसने तेजी से भुनाया। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स, जिनमें रॉयटर्स भी शामिल है, बताती हैं कि चीन सस्ते तेल से अपने रणनीतिक भंडार मजबूत कर रहा है। दूसरी ओर, अमेरिका रूस को आर्थिक रूप से अलग-थलग करने की कोशिश कर रहा है। कुल मिलाकर वैश्विक तेल बाजार में बड़ा बदलाव दिख रहा है- एक तरफ दबाव और प्रतिबंध, तो दूसरी तरफ ऊर्जा जरूरतों के हिसाब से देश अपने फैसले ले रहे हैं।