कोविड महामारी के बाद भारत ने खुद को दुनिया के अगले बड़े मैन्यूफैक्चरिंग हब के रूप में पेश करने की कोशिश तेज कर दी थी। स्मार्टफोन से लेकर सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन तक कई बड़े निवेश भारत आए। Apple जैसी कंपनियों ने भी भारत में उत्पादन बढ़ाया। इसी का असर रहा कि भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात 2015 के 8.6 अरब डॉलर से बढ़कर 2025 में 47 अरब डॉलर तक पहुंच गया।
चीन के नए नियम क्यों बने चिंता की वजह
अब चीन ने स्टेट काउंसिल डिक्री 834 और 835 लागू किए हैं, जिनके तहत कुछ महत्वपूर्ण मशीनरी, रेयर अर्थ मटेरियल और एडवांस टेक्नोलॉजी से जुड़े निर्यात पर नियंत्रण बढ़ाया गया है। उद्योग जगत को डर है कि इससे भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल और हाई-टेक मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर पर दबाव बढ़ सकता है।
असल खतरा सप्लाई चेन पर निर्भरता
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत अभी भी कई महत्वपूर्ण कंपोनेंट्स और मशीनों के लिए चीन पर काफी निर्भर है। ऑटो सेक्टर में इस्तेमाल होने वाले हाई-वैल्यू इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स का बड़ा हिस्सा चीन से आता है। आज की आधुनिक कारों में हजारों चिप्स और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम होते हैं। अगर इनकी सप्लाई प्रभावित हुई तो उत्पादन, लॉन्च और कीमतों पर असर पड़ सकता है।
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मोदी सरकार की क्या है तैयारी
पीयूष गोयल ने हाल ही में कहा कि सरकार महत्वपूर्ण सप्लाई चेन में “कुछ भौगोलिक क्षेत्रों” पर निर्भरता कम करने के लिए नई निवेश योजनाओं पर काम कर रही है। इसी दिशा में 33,660 करोड़ रुपये की ‘भव्य’ योजना भी लाई गई है, जिसके तहत देशभर में औद्योगिक पार्क विकसित किए जाएंगे।
क्या भारत के लिए यह मौका भी बन सकता है?
कई उद्योग विशेषज्ञ इसे सिर्फ खतरे के रूप में नहीं बल्कि अवसर के तौर पर भी देख रहे हैं। उनका मानना है कि अगर भारत रिसर्च, घरेलू सप्लायर नेटवर्क, लॉजिस्टिक्स और टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट पर तेजी से काम करे तो वह धीरे-धीरे चीन का विकल्प बन सकता है। हालांकि यह बदलाव रातोंरात संभव नहीं होगा।
आने वाले समय में क्या होगा असर
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत बिना चीनी मशीनरी और सप्लाई चेन के बड़े स्तर पर मैन्यूफैक्चरिंग बढ़ा पाएगा। विशेषज्ञ मानते हैं कि निकट भविष्य में भारत को कुछ चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, लेकिन अगर सरकार और उद्योग जगत मिलकर काम करें तो लंबे समय में यह संकट भारत को अधिक आत्मनिर्भर बनाने का रास्ता भी खोल सकता है।