दुनिया की टेक इंडस्ट्री के सामने एक नई चुनौती खड़ी हो गई है। चीन ने हीलियम के एक्सपोर्ट पर अस्थायी रोक लगाकर ग्लोबल सप्लाई चेन में हलचल मचा दी है। पहली नजर में यह फैसला सामान्य लग सकता है, लेकिन इसका असर सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मेडिकल उपकरण और हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग जैसे कई अहम क्षेत्रों पर पड़ सकता है। भारत भी इससे अछूता नहीं रहेगा, क्योंकि देश अपनी हीलियम जरूरतों के लिए पूरी तरह आयात पर निर्भर है।
भारत के लिए क्यों बढ़ी चिंता
भारत अपनी 100 फीसदी हीलियम जरूरत आयात के जरिए पूरी करता है और इसका बड़ा हिस्सा कतर से आता है। पश्चिम एशिया में पहले से जारी तनाव के कारण सप्लाई पर दबाव बना हुआ था। अब चीन के फैसले से वैश्विक बाजार में उपलब्ध हीलियम की मात्रा और कम हो सकती है। इसका असर भारत के सेमीकंडक्टर मिशन, मेडिकल सेक्टर, फाइबर ऑप्टिक्स और हाई-टेक उद्योगों की लागत पर पड़ने की आशंका है।
छोटी गैस, लेकिन बड़ा असर
हीलियम उत्पादन लागत का बड़ा हिस्सा नहीं होती, लेकिन चिप निर्माण की कई महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं में इसका कोई व्यावहारिक विकल्प नहीं है। यह वेफर कूलिंग, लीक टेस्टिंग, क्रायोजेनिक सिस्टम और कई हाई-प्रिसिजन मैन्युफैक्चरिंग स्टेप्स में इस्तेमाल होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इसकी सप्लाई लंबे समय तक प्रभावित रही तो उत्पादन प्रक्रिया धीमी पड़ सकती है और कंपनियों की लागत बढ़ सकती है।
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AI चिप्स और इलेक्ट्रॉनिक्स इंडस्ट्री पर असर
GPU, AI एक्सेलेरेटर, DRAM, NAND फ्लैश, हाई-बैंडविड्थ मेमोरी और ऑटोमोटिव चिप्स के निर्माण में बड़ी मात्रा में हीलियम की जरूरत होती है। नई पीढ़ी की एडवांस्ड चिप्स में इसकी खपत पहले की तुलना में कई गुना बढ़ चुकी है। ऐसे में यदि सप्लाई बाधित रहती है तो सबसे पहले हाई-एंड AI चिप्स और अत्याधुनिक सेमीकंडक्टर उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
पहले कीमतें बढ़ेंगी, फिर सप्लाई पर दबाव
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले का पहला असर हीलियम की कीमतों पर दिखाई देगा। पहले जिन कंपनियों को लंबे अनुबंधों के तहत अपेक्षाकृत कम कीमत पर हीलियम मिल रही थी, अब उन्हें अधिक भुगतान करना पड़ सकता है। स्पॉट मार्केट में कीमतें पहले ही कई गुना बढ़ चुकी हैं। हालांकि बड़े सेमीकंडक्टर निर्माता फिलहाल अपने रणनीतिक भंडार और रीसाइक्लिंग सिस्टम के सहारे स्थिति संभाल सकते हैं, लेकिन अगर यह संकट लंबे समय तक जारी रहा तो उत्पादन क्षमता और सप्लाई चेन दोनों पर दबाव बढ़ने की संभावना है।
चीन के फैसले ने यह साफ कर दिया है कि भविष्य की तकनीकी प्रतिस्पर्धा केवल चिप्स या AI तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि हीलियम जैसी अहम औद्योगिक गैसें भी वैश्विक रणनीतिक संसाधन बन चुकी हैं। ऐसे में भारत समेत कई देशों के लिए सप्लाई स्रोतों में विविधता लाना और रणनीतिक भंडार तैयार करना आने वाले समय की बड़ी जरूरत बन सकता है।