रेलवे में कंफर्म टिकट होने के बावजूद यात्रियों को सीट न मिलने का मामला अब रेलवे पर भारी पड़ गया है। भोजपुर जिला उपभोक्ता फोरम ने साफ कहा है कि अगर रेलवे ने किसी यात्री को कंफर्म टिकट दिया है, तो सीट या बर्थ दिलाना उसकी जिम्मेदारी है। मामला मुंबई के लोकमान्य तिलक टर्मिनस से पटना जाने वाली ट्रेन का है, जहां यात्रियों को पूरी यात्रा खड़े होकर करनी पड़ी।
रेल स्टाफ ने नहीं छोड़ी बर्थ
जानकारी के मुताबिक 13202 डाउन लोकमान्य तिलक टर्मिनस-पटना एक्सप्रेस में चार यात्रियों का विंध्याचल से आरा तक AC-3 के B4 कोच में कंफर्म रिजर्वेशन था। जब यात्री ट्रेन में पहुंचे तो उनकी बर्थ पर पहले से कुछ लोग बैठे थे। पूछने पर उन्होंने खुद को रेलवे स्टाफ बताया और सीट छोड़ने से इनकार कर दिया। यात्रियों ने कई बार अनुरोध किया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।
शिकायत के बाद भी नहीं मिली मदद
पीड़ित यात्रियों ने ट्रेन में मौजूद रेलवे कर्मचारियों से भी मदद मांगी, लेकिन उनकी समस्या का समाधान नहीं हुआ। मजबूरी में चारों यात्रियों को पूरी यात्रा खड़े होकर करनी पड़ी। ट्रेन से उतरने के बाद उन्होंने रेलवे और रेल मंत्रालय में शिकायत भी दर्ज कराई, लेकिन वहां से भी कोई राहत नहीं मिली। इसके बाद मामला भोजपुर जिला उपभोक्ता फोरम पहुंचा।
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कोर्ट ने रेलवे की दलील ठुकराई
सुनवाई के दौरान रेलवे ने इसे कानून-व्यवस्था का मामला बताते हुए कहा कि इसमें उनकी कोई गलती नहीं है। रेलवे ने कहा कि यह जिम्मेदारी जीआरपी की ज्यादा बनती है। लेकिन उपभोक्ता फोरम ने इस दलील को खारिज कर दिया। फोरम ने कहा कि यात्रियों ने हर संभव तरीके से मदद मांगने की कोशिश की, लेकिन उन्हें उनकी बर्थ नहीं मिल पाई। यह रेलवे सेवा में सीधी लापरवाही का मामला है।
अब रेलवे देगा ₹35 हजार का हर्जाना
उपभोक्ता फोरम ने उत्तर मध्य रेलवे और रेल मंत्रालय को आदेश दिया है कि वे यात्रियों को टिकट की राशि ब्याज सहित लौटाएं। साथ ही 20 हजार रुपये मुआवजा और 15 हजार रुपये मुकदमे का खर्च भी दें। कुल मिलाकर रेलवे को करीब ₹35 हजार से ज्यादा की राशि चुकानी होगी। फोरम ने यह रकम 60 दिनों के भीतर देने का आदेश दिया है, वरना अतिरिक्त ब्याज भी देना पड़ेगा।