Delhi Power Subsidy : नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने 2019-20 से 2022-23 के बीच दिल्ली सरकार की बिजली सब्सिडी योजना में कई अनियमितताओं को उजागर किया है। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने शुक्रवार को विधानसभा में कैग की रिपोर्ट पेश की। रिपोर्ट के मुताबिक, बिना बिजली खपत वाले कनेक्शनों को भी 42.26 करोड़ रुपये की सब्सिडी दी गई। कैग ने योजना में पारदर्शिता बढ़ाने और उपभोक्ता डेटा की नियमित जांच की जरूरत बताई है।
बिना खपत मिली सब्सिडी
कैग के अनुसार, कई उपभोक्ताओं ने लगातार कई बिलिंग साइकिल तक शून्य बिजली खपत के बावजूद सब्सिडी का लाभ उठाया। रिपोर्ट में इसे योजना की निगरानी व्यवस्था में गंभीर कमी के तौर पर देखा गया है। कैग ने सुझाव दिया है कि उपभोक्ताओं के डेटा की नियमित जांच होनी चाहिए, ताकि गलत या अपात्र कनेक्शनों तक सरकारी सहायता पहुंचने से रोकी जा सके।
ज्यादा खपत पर ज्यादा फायदा
रिपोर्ट में सब्सिडी के वितरण में भी असमानता सामने आई है। 0 से 200 यूनिट तक बिजली इस्तेमाल करने वाले 30 लाख से अधिक उपभोक्ताओं को औसतन करीब 6,000 रुपये सालाना सब्सिडी मिली। वहीं 201 से 400 यूनिट तक खपत करने वाले करीब 16.6 लाख उपभोक्ताओं को 10,000 रुपये से अधिक की औसत सालाना सब्सिडी मिली। यानी ज्यादा बिजली खपत करने वाले वर्ग को तुलनात्मक रूप से करीब 70 प्रतिशत अधिक लाभ मिला।
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2019 में शुरू हुई थी योजना
दिल्ली सरकार ने अगस्त 2019 में बिजली सब्सिडी योजना शुरू की थी। इसके तहत 200 यूनिट तक बिजली इस्तेमाल करने वाले घरेलू उपभोक्ताओं को मुफ्त बिजली और 201 से 400 यूनिट तक खपत पर 50 प्रतिशत सब्सिडी, अधिकतम 800 रुपये तक, देने की व्यवस्था थी। कैग के मुताबिक योजना का लाभ केवल जरूरतमंद उपभोक्ताओं तक सीमित नहीं रहा और बड़ी संख्या में घरेलू उपभोक्ताओं को इसका फायदा मिला।
बढ़ता गया सब्सिडी खर्च
रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में बिजली सब्सिडी पर सरकारी खर्च लगातार बढ़ा। वर्ष 2019-20 में यह खर्च 2,405.59 करोड़ रुपये था, जो 2022-23 में बढ़कर 3,161 करोड़ रुपये हो गया। कैग ने सुझाव दिया है कि सरकार एक पारदर्शी व्यवस्था विकसित करे और लाभार्थियों के आंकड़ों की नियमित निगरानी करे, जिससे सरकारी धन का सही इस्तेमाल सुनिश्चित हो सके।
बापरोला जमीन पर भी सवाल
कैग रिपोर्ट में दिल्ली राज्य औद्योगिक एवं अवसंरचना विकास निगम (DSIIDC) की बापरोला स्थित 81.42 एकड़ जमीन का मुद्दा भी उठाया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, जेम्स एंड ज्वेलरी पार्क के लिए वर्ष 2006 में ली गई इस जमीन का करीब 17 साल तक इस्तेमाल नहीं हुआ। योजना में बार-बार बदलाव के चलते 29.45 करोड़ रुपये का खर्च भी निष्फल होने की बात रिपोर्ट में कही गई है।