दिल्ली की हवा एक बार फिर खतरनाक स्तर पर पहुंच गई है। राजधानी का AQI 370 तक रिकॉर्ड किया गया, जबकि ग्रेटर नोएडा, नोएडा और गाजियाबाद में हालात उससे भी भयावह हैं। हवा में घुला जहर लोगों के लिए सांस लेना मुश्किल कर रहा है गले में जलन, आंखों में चुभन और सांस की दिक्कत जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। इसी बीच एक अंतरराष्ट्रीय स्टडी ने चौंकाने वाली सलाह दी है कि अगर दिल्ली को 2040 तक साफ हवा चाहिए, तो कोविड जैसे लॉकडाउन जैसी सख्त पाबंदियां लगानी होंगी। यानी वही खाली सड़कें, बंद बाजार और लोगों का घरों में रहना। स्टडी के मुताबिक अब साधारण प्रयास काफी नहीं होंगे और राजधानी को बचाने के लिए बेहद कठोर कदम उठाने होंगे।
डेटा ने खोली पोल, 36 साल में हवा क्यों नहीं सुधरी
अध्ययन बताता है कि 1989 से 2025 तक 36 साल के डेटा विश्लेषण में दिल्ली ने प्रदूषण के खिलाफ कोई बड़ा सुधार नहीं दिखाया। 2019 से अब तक दिल्ली का औसत PM 2.5 स्तर 100 के आसपास फंसा हुआ है जो राष्ट्रीय मानक से 2.5 गुना और WHO गाइडलाइन से 20 गुना अधिक है। विशेषज्ञों के अनुसार स्वच्छ वायु कार्यक्रम के तहत बनाई गई नीतियां अगर समय पर लागू होतीं तो 2040 का लक्ष्य पहले ही हासिल हो सकता था। स्टडी ने तीन प्रमुख उपाय सुझाए हैं मानवजनित उत्सर्जन में 55 फीसदी कमी, सर्दियों में हीटिंग स्रोतों पर 75 फीसदी रोक और पराली प्रदूषण पर 100 फीसदी नियंत्रण। रिपोर्ट साफ करती है कि इन तीनों के बिना दिल्ली की हवा सुधरना लगभग नामुमकिन है।
जमीन पर हालात बिगड़े, आरोप-प्रत्यारोप तेज
दिल्ली-NCR की मौजूदा हवा ने मशीनी दावों और सरकारी रिपोर्टों को गलत साबित कर दिया है। दिल्ली का AQI खतरनाक स्तर पर है और उससे भी खराब स्थिति ग्रेटर नोएडा, नोएडा और गाजियाबाद में दिख रही है। विपक्ष ने दिल्ली सरकार पर मॉनिटरिंग स्टेशनों पर पानी छिड़ककर AQI डेटा “सुधारने” का आरोप लगाया है। विशेषज्ञों का कहना है कि अभी हवा में प्रदूषण इतना घुल चुका है कि बच्चों, बुजुर्गों और अस्थमा मरीजों को घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए। डॉक्टरों ने अनिवार्य रूप से N95 मास्क पहनने और घरों में एयर प्यूरीफायर इस्तेमाल की सलाह दी है।
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क्या लौटेगा लॉकडाउन मॉडल?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है क्या दिल्ली दोबारा लॉकडाउन जैसे कड़े कदमों की ओर बढ़ रही है? क्या सरकार वर्क फ्रॉम होम, आधी गाड़ियां, बंद स्कूल और कम ट्रैफिक वाली रणनीति अपनाएगी? अभी सरकार ने कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की है, लेकिन एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर कड़े कदम नहीं उठाए गए तो अगले कुछ सालों में दिल्ली सांस लेने लायक भी नहीं बचेगी। पॉल्यूशन अब सिर्फ पर्यावरण का संकट नहीं, बल्कि जनजीवन और स्वास्थ्य का आपातकाल बन चुका है। इसलिए आने वाले दिनों में राजधानी की पूरी नजर इसी पर टिकी होगी कि सरकार प्रदूषण को रोकने के लिए कितना बड़ा और कितना कड़ा फैसला लेती है।