Jantar Mantar Protest Case : दिल्ली में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन को लेकर पुलिस की कार्रवाई अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई है। 10 अक्टूबर को प्रस्तावित प्रदर्शन से पहले दिल्ली में सुरक्षा बढ़ाने, मेट्रो सेवाओं पर पाबंदियां लगाने और प्रदर्शन की अनुमति नहीं देने को लेकर सवाल उठे थे। अब दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर अपने कदमों का बचाव किया है। पुलिस का कहना है कि यह फैसला किसी को परेशान करने के लिए नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने और लोगों की सुरक्षा को ध्यान में रखकर लिया गया था। इस मामले में पुलिस ने क्या दलीलें दी हैं और पूरे विवाद की वजह क्या है, चलिए जानते हैं।
सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली पुलिस ने क्या कहा
दिल्ली पुलिस ने अपने हलफनामे में कहा कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति नहीं देने का फैसला पहले हुए प्रदर्शन के दौरान नियमों के कथित उल्लंघन और हिंसा की आशंका को देखते हुए लिया गया। पुलिस के मुताबिक, उसका मकसद राजधानी में शांति बनाए रखना और किसी भी तरह की अप्रिय घटना को रोकना था। पुलिस ने अपनी कार्रवाई को जरूरी और हालात के हिसाब से सही बताया है।
मेट्रो सेवाओं पर पाबंदी की क्या थी वजह
प्रदर्शन के दौरान दिल्ली मेट्रो की सेवाओं को लेकर भी विवाद हुआ। पुलिस ने दलील दी कि भीड़ के अचानक बढ़ने और संवेदनशील इलाकों की ओर लोगों के जाने की आशंका थी। इसी वजह से सुरक्षा के लिए कुछ मेट्रो स्टेशनों पर रोक लगाने और सेवाओं को नियंत्रित करने जैसे कदम उठाए गए। पुलिस का कहना है कि ये पाबंदियां पूरे मेट्रो नेटवर्क पर नहीं, बल्कि कुछ हिस्सों तक सीमित थीं।
पुराने प्रदर्शन का भी दिया हवाला
दिल्ली पुलिस ने अपने जवाब में 20 जुलाई को हुए प्रदर्शन का भी जिक्र किया। पुलिस के मुताबिक, आयोजकों ने करीब 1,000 लोगों के शामिल होने की बात कही थी, लेकिन वहां 30,000 से ज्यादा लोग पहुंच गए थे। पुलिस ने दावा किया कि उस दौरान हालात बिगड़े और करीब 240 पुलिसकर्मी घायल हुए। इसी पुराने अनुभव को अक्टूबर में सुरक्षा के कड़े इंतजाम करने की एक बड़ी वजह बताया गया है। हालांकि, ये बातें पुलिस के हलफनामे में दी गई दलीलें हैं।
प्रदर्शन की अनुमति को लेकर भी उठे सवाल
पुलिस ने यह भी कहा कि कॉकroach जनता पार्टी (सीजेपी) की ओर से 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की सूचना दी गई थी, लेकिन तय प्रक्रिया के तहत औपचारिक अनुमति के लिए आवेदन नहीं किया गया था। पुलिस के अनुसार, प्रदर्शन से जुड़ी सूचना 7 अक्टूबर को मिली थी, जबकि तय दिशा-निर्देशों के तहत कम से कम 10 दिन पहले आवेदन करना होता है। इसी के आधार पर प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी गई।
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अब सुप्रीम कोर्ट के रुख पर टिकी नजरें
इस पूरे मामले में अब सुप्रीम कोर्ट की आगे की सुनवाई अहम होगी। केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस ने अपनी कार्रवाई को कानून-व्यवस्था से जुड़ी जरूरत बताया है। वहीं, प्रदर्शन पर रोक और आवाजाही से जुड़ी पाबंदियों को लेकर सवाल भी उठे हैं। ऐसे में अदालत के सामने यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सुरक्षा के लिए उठाए गए कदम जरूरी और उचित थे या नहीं। इस मामले का असर आगे दिल्ली में होने वाले प्रदर्शनों की अनुमति और सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े फैसलों पर भी पड़ सकता है।