मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान दो सदस्यीय पीठ की राय अलग-अलग सामने आई। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ के सामने मुख्य सवाल यह था कि मामले को बड़ी पीठ के पास भेजा जाए या नहीं। दोनों न्यायाधीशों की अलग राय के बाद अब मामला संविधान पीठ के सामने जाएगा। यह विवाद उस कानून की संवैधानिक वैधता से जुड़ा है, जिसके तहत चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए नई चयन व्यवस्था बनाई गई है।
नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर है पूरा विवाद
याचिकाकर्ताओं ने 2023 के कानून की नियुक्ति प्रक्रिया को चुनौती दी है। मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने व्यवस्था दी थी कि संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश वाली समिति की सलाह पर होगी। इसके बाद संसद ने 2023 में नया कानून पारित किया, जिसमें मुख्य न्यायाधीश को चयन समिति से बाहर रखा गया और उनकी जगह केंद्रीय मंत्रिमंडल के एक मंत्री को शामिल किया गया।
सॉलिसिटर जनरल की दलील पर जस्टिस दत्ता की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल की ओर से नियुक्ति व्यवस्था को लेकर दी गई एक दलील पर जस्टिस दीपांकर दत्ता ने आपत्ति जताई। रिपोर्ट के मुताबिक, अदालत के सामने यह तर्क रखा गया था कि यह व्यवस्था कहीं न्यायाधीशों द्वारा न्यायाधीशों की नियुक्ति जैसी न हो जाए। जस्टिस दत्ता ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया और कहा कि ऐसी तुलना उचित नहीं है। अदालत के सामने मुख्य सवाल यह भी रहा कि 2023 के फैसले में तय की गई व्यवस्था स्थायी थी या संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक केवल अंतरिम व्यवस्था के तौर पर लागू थी।
याचिकाकर्ताओं ने सीजेआई को शामिल करने की मांग की
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स और अन्य याचिकाकर्ताओं ने नए कानून की नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। उनका तर्क है कि चयन समिति में प्रधानमंत्री और उनके द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री के होने से सरकार के पक्ष में दो सदस्य हो जाते हैं, जबकि विपक्ष के नेता के पास एक ही सदस्य रहता है। याचिकाओं में कानून की उन धाराओं को चुनौती दी गई है, जिनमें चयन समिति और नियुक्ति की प्रक्रिया निर्धारित की गई है। याचिकाकर्ताओं की मांग है कि मुख्य न्यायाधीश को चयन प्रक्रिया में फिर से शामिल किया जाए।
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2023 से शुरू हुआ नियुक्ति प्रक्रिया का विवाद
इस मामले की पृष्ठभूमि 2023 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से जुड़ी है। उस समय अदालत ने कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 324(2) के तहत संसद को चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से संबंधित कानून बनाना है। तब तक एक विशेष समिति की व्यवस्था लागू की गई थी। बाद में संसद ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति, सेवा शर्तों और कार्यकाल से संबंधित कानून पारित किया। इसी कानून को अब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। मई 2026 की सुनवाई में अदालत ने यह सवाल भी उठाया था कि 2023 के फैसले के मूल आधार और उसकी भावना पर संसद में पर्याप्त चर्चा हुई थी या नहीं।
अब दो न्यायाधीशों की अलग-अलग राय के बाद मामले की सुनवाई संविधान पीठ के समक्ष होगी। बड़ी पीठ इस पूरे विवाद में कानून की संवैधानिक स्थिति और 2023 के फैसले के साथ इसके संबंध पर विचार करेगी। फिलहाल अदालत ने मामले पर अंतिम फैसला नहीं दिया है।