भारतीय रुपया लगातार दबाव में बना हुआ है और डॉलर के मुकाबले इसकी कमजोरी ने बाजार में चिंता बढ़ा दी है। हालात ऐसे हैं कि रुपया 96 के स्तर के ऊपर पहुंच चुका है और हाल ही में यह 97 के करीब तक फिसल गया था। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें और बढ़ीं तथा विदेशी निवेशकों की बिकवाली जारी रही, तो आने वाले समय में रुपया 100 के स्तर तक भी पहुंच सकता है। हालांकि गुरुवार को रुपये में थोड़ी रिकवरी जरूर देखने को मिली और यह 96.45 के आसपास कारोबार करता नजर आया।
तेल और डॉलर ने बढ़ाया दबाव
भारतीय मुद्रा पर सबसे बड़ा दबाव कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और मजबूत अमेरिकी डॉलर का है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है और जब तेल महंगा होता है, तो डॉलर की मांग बढ़ जाती है। इसके अलावा विदेशी निवेशकों ने इस साल भारतीय बाजार से 2 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की बिकवाली की है। इससे रुपये पर अतिरिक्त दबाव बना हुआ है। पिछले एक साल में भारतीय मुद्रा करीब 10 से 12 प्रतिशत तक कमजोर हुई है।
पाकिस्तान और बांग्लादेश की करेंसी का हाल
सिर्फ भारतीय रुपया ही नहीं, पाकिस्तान और बांग्लादेश की करेंसी भी डॉलर के मुकाबले कमजोर बनी हुई है। पाकिस्तान को IMF सहायता और आयात नियंत्रण से कुछ राहत जरूर मिली, लेकिन वहां की आर्थिक चुनौतियां अब भी गंभीर हैं। दूसरी तरफ बांग्लादेशी टका पर भी विदेशी मुद्रा भंडार में कमी और बढ़ते आयात बिल का असर साफ दिखाई दे रहा है। कई रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया कि हाल के महीनों में भारतीय रुपया टका के मुकाबले भी कमजोर हुआ है।
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चीन और रूस ने दिखाई मजबूती
जहां कई एशियाई मुद्राएं दबाव में हैं, वहीं चीन और रूस की स्थिति कुछ अलग नजर आई। चीन के केंद्रीय बैंक ने लगातार हस्तक्षेप कर युआन को ज्यादा गिरने नहीं दिया। यही वजह रही कि डॉलर के मुकाबले युआन सीमित दायरे में बना रहा। दूसरी ओर रूस का रूबल पिछले एक साल में मजबूत हुआ है। मई 2025 में जहां एक डॉलर के लिए करीब 90 रूबल खर्च करने पड़ते थे, वहीं अब यह स्तर 71 से 74 रूबल के बीच आ गया है।
जापानी येन भी दबाव में
जापान की मुद्रा येन भी इस समय कमजोर दौर से गुजर रही है। जापान में बेहद कम ब्याज दरों की वजह से डॉलर के मुकाबले येन पर दबाव बना हुआ है। पिछले एक साल में जापानी करेंसी में करीब 7 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। इससे साफ है कि वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता और मजबूत डॉलर ने लगभग सभी बड़ी एशियाई मुद्राओं को प्रभावित किया है।