
भारत में दहेज एक ऐसी सामाजिक बुराई है, जो कानूनन अपराध होने के बावजूद समाज में गहरी जड़ें जमाए हुए है. यह न केवल परिवारों को तोड़ रही है, बल्कि अब सोशल मीडिया के जरिए इसे 'स्टेटस सिंबल' के रूप में प्रचारित किया जा रहा है. इंस्टाग्राम रील्स और यूट्यूब वीडियो में दूल्हे अपनी दहेज में मिली महंगी कारों, सोने के गहनों और यहां तक कि हथियारों के साथ पोज देते नजर आते हैं. ये रील्स दहेज को न केवल सामान्य बनाती हैं, बल्कि इसे एक आकर्षक और गर्व का विषय बनाकर पेश करती हैं. हाल ही में ग्रेटर नोएडा में निक्की भाटी की दहेज के कारण हुई मौत ने इस कुप्रथा की भयावह सच्चाई को फिर से सामने ला दिया. समाजशास्त्रियों और समुदाय के नेताओं का कहना है कि दहेज के खिलाफ कोई ठोस और निरंतर प्रयास नहीं हुआ है जिसके चलते यह प्रथा आज भी समाज में फल-फूल रही है.
दहेज का खुला प्रदर्शन, परंपरा के नाम पर अपराध
दिल्ली में जनवरी की एक ठंडी रात में एक शादी समारोह में मेहमान शादी के पंडाल में बैठे थे. तभी दुल्हन का भाई खड़ा हुआ और उसने गर्व के साथ अपनी बहन के लिए दिए जा रहे 'उपहारों' की लंबी सूची पढ़ी. एक चमचमाती SUV, 30 तोले सोना, फर्नीचर और कई होम अप्लायंसेज. मेहमानों ने तालियां बजाकर इसका स्वागत किया. इस पूरे दृश्य को मोबाइल फोन में रिकॉर्ड किया गया और जल्द ही यह वीडियो इंस्टाग्राम पर वायरल हो गया. इसे हजारों लाइक्स और हार्ट इमोजी मिले. जिसे कानून 'दहेज' कहकर अपराध मानता है, उसे यहां 'परंपरा' और 'मान-सम्मान' के नाम पर खुलेआम प्रदर्शित किया गया. यह दृश्य आज के भारत में असामान्य नहीं है. कई परिवार दहेज को 'रिवाज' के रूप में स्वीकार करते हैं और सोशल मीडिया इसे और बढ़ावा दे रहा है.
इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर ऐसी रील्स और शॉर्ट वीडियो की भरमार है, जहां दूल्हे अपनी दहेज में मिली लग्जरी कार, ट्रैक्टर, सोने की चेन या यहां तक कि हथियारों के साथ पोज देते हैं. इन वीडियो के कैप्शन में लिखा होता है: "शादी के तोहफे", "ससुरजी का प्यार", या "दहेज लेने की औकात होनी चाहिए". ये रील्स न केवल दहेज को सामान्य बनाती हैं, बल्कि इसे युवाओं के लिए एक आकर्षक और प्रेरणादायक प्रथा के रूप में पेश करती हैं. समाज में यह धारणा बन रही है कि दहेज लेना दूल्हे की सामाजिक हैसियत और ससुर की संपत्ति का प्रतीक है.
निक्की भाटी केस दहेज की क्रूर सच्चाई
ग्रेटर नोएडा में निक्की भाटी की कथित दहेज हत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया. निक्की की शादी को कुछ ही महीने हुए थे, जब दहेज की मांग के कारण उनकी जान चली गई. यह घटना राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनी और लोगों में आक्रोश फैल गया. लेकिन इस त्रासदी की गहराई में जाने पर एक और परेशान करने वाला तथ्य सामने आया. निक्की के परिवार में पहले भी दहेज से जुड़ा विवाद हो चुका था. उनकी भाभी ने आरोप लगाया कि उन्हें भी दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया था और उस समय निक्की ने अपने भाई का साथ देते हुए भाभी के खिलाफ खड़े होने का रास्ता चुना था. यह विडंबना दर्शाती है कि दहेज की प्रथा एक परिवार के भीतर ही कितने विरोधाभास पैदा करती है.
ये भी पढ़ें : Jammu-Kashmir में प्राकृतिक आपदा के चलते Railway का फैसला, रद्द कीं कई ट्रेनें, 5000 से ज्यादा रिजर्वेशन कैंसिल
निक्की की मौत ने यह सवाल फिर से उठाया कि आखिर दहेज जैसी कुप्रथा को खत्म करने के लिए समाज और सरकार क्या कर रहे हैं? राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े बताते हैं कि भारत में हर साल 6000 से ज्यादा दहेज हत्याएं होती हैं, लेकिन दोषियों को सजा देने की दर बेहद कम है. कानूनन दहेज देना और लेना दोनों अपराध हैं फिर भी यह प्रथा समाज में खुलेआम जारी है.
सोशल मीडिया बना दहेज का नया मंच
पहले दहेज का लेन-देन गांव की चौपालों या परिवार की चारदीवारी तक सीमित था. लेकिन अब सोशल मीडिया ने इसे एक वैश्विक मंच दे दिया है. इंस्टाग्राम रील्स और यूट्यूब शॉर्ट्स में दूल्हे अपनी नई SUV चलाते, नोटों की गड्डियां गिनते या सोने की चेन और हथियारों के साथ पोज देते दिखते हैं. इन वीडियो को हजारों लाइक्स और कमेंट्स मिलते हैं जो दहेज को सामान्य और स्वीकार्य बनाते हैं. कुछ कैप्शन जैसे "गिफ्ट अमीर दूल्हों के लिए होते हैं, गरीब मजदूरों के लिए नहीं" या "ऐसा ससुर मिल जाए तो जिंदगी सेट" युवाओं को दहेज की ओर आकर्षित करते हैं.
दिल्ली के गुज्जर समुदाय के नेता धर्मेंद्र भगत ने एक बातचीत में कहा कि पहले दहेज को मान-सम्मान का हिस्सा माना जाता था. हर पिता अपनी बेटी को गहने और उपहार देना चाहता था, लेकिन अब यह एक होड़ में बदल गया है. लोग अब यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि कौन बड़ी कार या ज्यादा सोना दे सकता है. सोशल मीडिया ने इस दिखावे को और बढ़ावा दिया है, जहां दहेज को 'शादी के तोहफे' के रूप में प्रचारित किया जाता है.
दहेज प्रतिष्ठा है या दिखावे की संस्कृति?
दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे क्षेत्रों में खासकर गुज्जर समुदाय में दहेज को प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता है. शादी में दी जाने वाली सूची में अब कार, ट्रैक्टर, जमीन, और यहां तक कि हथियार भी शामिल हो गए हैं. समाजशास्त्री शिव विश्वनाथन का कहना है कि दहेज अब लालच से ज्यादा दिखावे की संस्कृति से जुड़ा है. यह एक ऐसी प्रथा बन गई है, जहां दुल्हन का पिता अपनी संपत्ति, दूल्हा अपनी योग्यता और समुदाय दोनों को मान्यता देने का खेल खेलता है.
गुज्जर समुदाय के एक अन्य नेता उपेंद्र करहाना ने कहा कि युवा सोशल मीडिया का सही इस्तेमाल नहीं कर पाते. निक्की भाटी मामले में भी इंस्टाग्राम रील्स एक बड़ा मुद्दा थी. अब दहेज का मकसद मान-सम्मान नहीं बल्कि दिखावा बन गया है. खासकर उन परिवारों में जिनके पास हाल ही में पैसा आया है. दहेज को स्कॉर्पियो या अन्य महंगी चीजों के जरिए प्रदर्शित किया जाता है. समुदाय के बुजुर्ग चंद्रपाल अवान ने बताया कि कई पंचायतों में दहेज रोकने की बात होती है लेकिन जब लोग अपनी बेटियों की शादी करते हैं तो वो खुद दहेज लेने-देने में शामिल हो जाते हैं.
कानून और समाज का विरोधाभास
भारत में दहेज निषेध अधिनियम 1961 मेंp style="text-align: left;">भारत में दहेज एक ऐसी सामाजिक बुराई है, जो कानूनन अपराध होने के बावजूद समाज में गहरी जड़ें जमाए हुए है. यह न केवल परिवारों को तोड़ रही है, बल्कि अब सोशल मीडिया के जरिए इसे 'स्टेटस सिंबल' के रूप में प्रचारित किया जा रहा है. इंस्टाग्राम रील्स और यूट्यूब वीडियो में दूल्हे अपनी दहेज में मिली महंगी कारों, सोने के गहनों और यहां तक कि हथियारों के साथ पोज देते नजर आते हैं. ये रील्स दहेज को न केवल सामान्य बनाती हैं, बल्कि इसे एक आकर्षक और गर्व का विषय बनाकर पेश करती हैं. हाल ही में ग्रेटर नोएडा में निक्की भाटी की दहेज के कारण हुई मौत ने इस कुप्रथा की भयावह सच्चाई को फिर से सामने ला दिया. समाजशास्त्रियों और समुदाय के नेताओं का कहना है कि दहेज के खिलाफ कोई ठोस और निरंतर प्रयास नहीं हुआ है जिसके चलते यह प्रथा आज भी समाज में फल-फूल रही है.
दहेज का खुला प्रदर्शन, परंपरा के नाम पर अपराध
दिल्ली में जनवरी की एक ठंडी रात में एक शादी समारोह में मेहमान शादी के पंडाल में बैठे थे. तभी दुल्हन का भाई खड़ा हुआ और उसने गर्व के साथ अपनी बहन के लिए दिए जा रहे 'उपहारों' की लंबी सूची पढ़ी. एक चमचमाती SUV, 30 तोले सोना, फर्नीचर और कई होम अप्लायंसेज. मेहमानों ने तालियां बजाकर इसका स्वागत किया. इस पूरे दृश्य को मोबाइल फोन में रिकॉर्ड किया गया और जल्द ही यह वीडियो इंस्टाग्राम पर वायरल हो गया. इसे हजारों लाइक्स और हार्ट इमोजी मिले. जिसे कानून 'दहेज' कहकर अपराध मानता है, उसे यहां 'परंपरा' और 'मान-सम्मान' के नाम पर खुलेआम प्रदर्शित किया गया. यह दृश्य आज के भारत में असामान्य नहीं है. कई परिवार दहेज को 'रिवाज' के रूप में स्वीकार करते हैं और सोशल मीडिया इसे और बढ़ावा दे रहा है.
इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर ऐसी रील्स और शॉर्ट वीडियो की भरमार है, जहां दूल्हे अपनी दहेज में मिली लग्जरी कार, ट्रैक्टर, सोने की चेन या यहां तक कि हथियारों के साथ पोज देते हैं. इन वीडियो के कैप्शन में लिखा होता है: "शादी के तोहफे", "ससुरजी का प्यार", या "दहेज लेने की औकात होनी चाहिए". ये रील्स न केवल दहेज को सामान्य बनाती हैं, बल्कि इसे युवाओं के लिए एक आकर्षक और प्रेरणादायक प्रथा के रूप में पेश करती हैं. समाज में यह धारणा बन रही है कि दहेज लेना दूल्हे की सामाजिक हैसियत और ससुर की संपत्ति का प्रतीक है.
निक्की भाटी केस दहेज की क्रूर सच्चाई
ग्रेटर नोएडा में निक्की भाटी की कथित दहेज हत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया. निक्की की शादी को कुछ ही महीने हुए थे, जब दहेज की मांग के कारण उनकी जान चली गई. यह घटना राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनी और लोगों में आक्रोश फैल गया. लेकिन इस त्रासदी की गहराई में जाने पर एक और परेशान करने वाला तथ्य सामने आया. निक्की के परिवार में पहले भी दहेज से जुड़ा विवाद हो चुका था. उनकी भाभी ने आरोप लगाया कि उन्हें भी दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया था और उस समय निक्की ने अपने भाई का साथ देते हुए भाभी के खिलाफ खड़े होने का रास्ता चुना था. यह विडंबना दर्शाती है कि दहेज की प्रथा एक परिवार के भीतर ही कितने विरोधाभास पैदा करती है.
ये भी पढ़ें : Jammu-Kashmir में प्राकृतिक आपदा के चलते Railway का फैसला, रद्द कीं कई ट्रेनें, 5000 से ज्यादा रिजर्वेशन कैंसिल
निक्की की मौत ने यह सवाल फिर से उठाया कि आखिर दहेज जैसी कुप्रथा को खत्म करने के लिए समाज और सरकार क्या कर रहे हैं? राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े बताते हैं कि भारत में हर साल 6000 से ज्यादा दहेज हत्याएं होती हैं, लेकिन दोषियों को सजा देने की दर बेहद कम है. कानूनन दहेज देना और लेना दोनों अपराध हैं फिर भी यह प्रथा समाज में खुलेआम जारी है.
सोशल मीडिया बना दहेज का नया मंच
पहले दहेज का लेन-देन गांव की चौपालों या परिवार की चारदीवारी तक सीमित था. लेकिन अब सोशल मीडिया ने इसे एक वैश्विक मंच दे दिया है. इंस्टाग्राम रील्स और यूट्यूब शॉर्ट्स में दूल्हे अपनी नई SUV चलाते, नोटों की गड्डियां गिनते या सोने की चेन और हथियारों के साथ पोज देते दिखते हैं. इन वीडियो को हजारों लाइक्स और कमेंट्स मिलते हैं जो दहेज को सामान्य और स्वीकार्य बनाते हैं. कुछ कैप्शन जैसे "गिफ्ट अमीर दूल्हों के लिए होते हैं, गरीब मजदूरों के लिए नहीं" या "ऐसा ससुर मिल जाए तो जिंदगी सेट" युवाओं को दहेज की ओर आकर्षित करते हैं.
दिल्ली के गुज्जर समुदाय के नेता धर्मेंद्र भगत ने एक बातचीत में कहा कि पहले दहेज को मान-सम्मान का हिस्सा माना जाता था. हर पिता अपनी बेटी को गहने और उपहार देना चाहता था, लेकिन अब यह एक होड़ में बदल गया है. लोग अब यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि कौन बड़ी कार या ज्यादा सोना दे सकता है. सोशल मीडिया ने इस दिखावे को और बढ़ावा दिया है, जहां दहेज को 'शादी के तोहफे' के रूप में प्रचारित किया जाता है.
दहेज प्रतिष्ठा है या दिखावे की संस्कृति?
दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे क्षेत्रों में खासकर गुज्जर समुदाय में दहेज को प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता है. शादी में दी जाने वाली सूची में अब कार, ट्रैक्टर, जमीन, और यहां तक कि हथियार भी शामिल हो गए हैं. समाजशास्त्री शिव विश्वनाथन का कहना है कि दहेज अब लालच से ज्यादा दिखावे की संस्कृति से जुड़ा है. यह एक ऐसी प्रथा बन गई है, जहां दुल्हन का पिता अपनी संपत्ति, दूल्हा अपनी योग्यता और समुदाय दोनों को मान्यता देने का खेल खेलता है.
गुज्जर समुदाय के एक अन्य नेता उपेंद्र करहाना ने कहा कि युवा सोशल मीडिया का सही इस्तेमाल नहीं कर पाते. निक्की भाटी मामले में भी इंस्टाग्राम रील्स एक बड़ा मुद्दा थी. अब दहेज का मकसद मान-सम्मान नहीं बल्कि दिखावा बन गया है. खासकर उन परिवारों में जिनके पास हाल ही में पैसा आया है. दहेज को स्कॉर्पियो या अन्य महंगी चीजों के जरिए प्रदर्शित किया जाता है. समुदाय के बुजुर्ग चंद्रपाल अवान ने बताया कि कई पंचायतों में दहेज रोकने की बात होती है लेकिन जब लोग अपनी बेटियों की शादी करते हैं तो वो खुद दहेज लेने-देने में शामिल हो जाते हैं.
कानून और समाज का विरोधाभास
भारत में दहेज निषेध अधिनियम 1961 मेंलागू हुआ था. भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A पति या रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता को अपराध मानती है और धारा 304B दहेज हत्या से संबंधित है. इसके बावजूद दहेज से जुड़े अपराध रुकने का नाम नहीं ले रहे. NCRB के आंकड़े बताते हैं कि हर साल 6000 से ज्यादा दहेज हत्याएं होती हैं, लेकिन दोषियों को सजा देने की दर बेहद कम है. इसका कारण है समाज में दहेज को अपराध न मानना. लोग इसे "स्वैच्छिक उपहार" या "परंपरा" के रूप में देखते हैं. जब दहेज की मांग पूरी नहीं होती तब यह क्रूरता और हिंसक अपराध में बदल जाता है.
सामाजिक सुधार की कमी
समाजशास्त्री शिव विश्वनाथन का कहना है कि दहेज के खिलाफ कोई वास्तविक सामाजिक सुधार नहीं हुआ है. बाल विवाह और सती प्रथा जैसी कुप्रथाओं के खिलाफ समाज में जागरूकता और आंदोलन हुए, लेकिन दहेज के खिलाफ ऐसी कोई सशक्त पहल नहीं दिखी. सामाजिक सुधार के बिना कानूनी सुधार प्रभावी नहीं हो सकते. समुदाय के बुजुर्गों का कहना है कि पंचायतों में दहेज रोकने की बात तो होती है, लेकिन लोग अपने निजी हितों के लिए इसे नजरअंदाज कर देते हैं.
सोशल मीडिया की भूमिका
सोशल मीडिया ने दहेज को एक नया आयाम दिया है. पहले यह गांवों तक सीमित था, लेकिन अब यह वैश्विक मंच पर प्रदर्शित हो रहा है. इंस्टाग्राम रील्स और यूट्यूब वीडियो में दहेज को 'शादी के तोहफे' के रूप में दिखाया जाता है, जो युवाओं को इस कुप्रथा की ओर आकर्षित करता है. समाजशास्त्रियों का कहना है कि सोशल मीडिया ने दहेज को सामान्य बनाने में बड़ी भूमिका निभाई है. यह न केवल दिखावे को बढ़ावा देता है, बल्कि इसे एक आकांक्षा के रूप में पेश करता है.
दहेज जैसी कुप्रथा को खत्म करने के लिए कानूनी और सामाजिक दोनों स्तरों पर प्रयास जरूरी हैं. समाजशास्त्रियों का सुझाव है कि इसके लिए जागरूकता अभियान चलाए जाएं, खासकर युवाओं को लक्षित करते हुए. स्कूलों और कॉलेजों में दहेज के दुष्परिणामों के बारे में शिक्षा दी जानी चाहिए. सोशल मीडिया पर दहेज को बढ़ावा देने वाली सामग्री पर निगरानी और नियंत्रण की जरूरत है. इसके अलावा कानून का सख्ती से पालन और दोषियों को त्वरित सजा सुनिश्चित करना होगा. दहेज एक ऐसी सामाजिक बुराई है, जो न केवल महिलाओं की जिंदगी को खतरे में डाल रही है, बल्कि समाज की नैतिकता को भी कमजोर कर रही है. निक्की भाटी जैसी घटनाएं इसकी भयावहता को उजागर करती हैं.