देशभर में E20 पेट्रोल को लेकर सोशल मीडिया पर कई तरह के दावे वायरल हो रहे हैं। कहीं इंजन खराब होने की बात कही जा रही है तो कहीं माइलेज घटने और पेट्रोल टैंक पर चींटियां या मधुमक्खियां आने जैसे वीडियो शेयर किए जा रहे हैं। इन दावों के बीच पेट्रोलियम मंत्रालय ने पहली बार विस्तार से अपनी बात रखी है। सरकार का कहना है कि E20 कोई नया प्रयोग नहीं है और कई देशों में वर्षों से इसका सफलतापूर्वक इस्तेमाल हो रहा है। भारत भी दिसंबर 2025 में 20 प्रतिशत एथेनॉल ब्लेंडिंग का लक्ष्य हासिल कर चुका है।
क्या इंजन पर पड़ता है असर?
सरकार के मुताबिक ARAI, IOCL और SIAM समेत कई संस्थानों ने E20 पेट्रोल पर लंबी तकनीकी जांच की है। परीक्षण के दौरान कारों को 40 हजार किलोमीटर और दोपहिया वाहनों को 20 हजार किलोमीटर तक चलाया गया। जांच में इंजन, स्टार्टिंग, ड्राइविंग और ज्यादातर पार्ट्स में कोई बड़ी तकनीकी समस्या सामने नहीं आई। हालांकि सरकार ने माना कि कुछ पुराने वाहनों में रबर के कुछ पुर्जे सामान्य से पहले बदलने पड़ सकते हैं।
माइलेज पर क्या बोली सरकार?
सरकार ने पहली बार स्वीकार किया है कि E20 पेट्रोल से माइलेज में हल्की कमी आ सकती है। हालांकि उसका कहना है कि माइलेज सिर्फ ईंधन पर निर्भर नहीं करती, बल्कि ड्राइविंग स्टाइल, ट्रैफिक, सड़क की स्थिति, टायर प्रेशर और वाहन की सर्विसिंग जैसे कई दूसरे कारण भी इसमें भूमिका निभाते हैं। सरकार का दावा है कि E20 से इंजन की नॉकिंग कम होती है, ऑक्टेन रेटिंग बेहतर होती है और कई परिस्थितियों में पिकअप भी अच्छा मिल सकता है।
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चींटियों और मधुमक्खियों वाले दावे पर जवाब
सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो को लेकर सरकार ने भी सफाई दी है। बीपीसीएल के अनुसार फ्यूल ग्रेड एथेनॉल में किसी तरह की शुगर नहीं होती और इसमें ऐसे तत्व मिलाए जाते हैं जो कीड़ों को दूर रखते हैं। इसलिए E20 पेट्रोल की वजह से चींटियां या मधुमक्खियां पेट्रोल टैंक पर जमा होने का दावा वैज्ञानिक रूप से सही नहीं माना गया है।
सरकार ने बताए फायदे, बहस अब भी जारी
सरकार का दावा है कि एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम से विदेशी मुद्रा की बड़ी बचत हुई है, किसानों को लाभ मिला है, कार्बन उत्सर्जन कम हुआ है और कच्चे तेल के आयात में भी कमी आई है। साथ ही सरकार ने कहा है कि E20 से जुड़े इंश्योरेंस पर कोई असर नहीं पड़ेगा। यदि भविष्य में E25 लागू करने पर विचार होगा तो उससे पहले व्यापक तकनीकी परीक्षण और सभी संबंधित पक्षों से सलाह ली जाएगी। हालांकि पानी की खपत, फीडस्टॉक, कृषि और पर्यावरण पर इसके प्रभाव को लेकर विशेषज्ञों के बीच बहस अब भी जारी है, इसलिए आने वाले समय में स्वतंत्र अध्ययन और निगरानी अहम मानी जा रही है।