पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले सियासी हलचल तेज हो गई है। इसी बीच प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। कोयला घोटाले से जुड़े मामले में कोलकाता में पॉलिटिकल कंसल्टेंसी फर्म आईपैक के दफ्तर और उसके प्रमुख प्रतीक जैन के घर पर छापेमारी हुई। इस कार्रवाई के दौरान मौके पर ममता बनर्जी का पहुंचना और फाइल व लैपटॉप को लेकर निकलना भी चर्चा का विषय बन गया। इसके बाद लोगों के मन में सवाल उठा कि आखिर आईपैक है क्या और यह पैसा कैसे कमाती है।
क्या है आईपैक और कैसे हुई शुरुआत
आईपैक यानी इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी की नींव वर्ष दो हजार तेरह में प्रशांत किशोर ने अपने सहयोगियों प्रतीक जैन, ऋषिराज सिंह और विनेश चंदेल के साथ रखी थी। शुरुआत में इसका नाम सिटीजन फॉर अकाउंटेबल गवर्नेंस रखा गया था। बाद में यह आईपैक के नाम से जानी गई। कंपनी का मकसद राजनीतिक दलों को चुनावी रणनीति और संगठन मजबूत करने में मदद देना रहा।
कई बड़े चुनावों में निभाई भूमिका
आईपैक के जरिए ही दो हजार चौदह के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के प्रचार अभियान को दिशा मिली थी। इसके बाद बिहार में नीतीश कुमार, पंजाब में अमरिंदर सिंह और आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी के लिए भी इस कंपनी ने काम किया। बाद के वर्षों में आईपैक ने पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के साथ लंबा काम किया। दो हजार इक्कीस के बाद प्रशांत किशोर ने खुद को कंपनी से अलग कर लिया और संचालन की जिम्मेदारी अन्य निदेशकों के हाथ में चली गई।
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चुनावी रणनीति से होती है कमाई
आईपैक की कमाई का मुख्य जरिया राजनीतिक दलों और नेताओं को दी जाने वाली चुनावी सलाह है। यह कंपनी उम्मीदवार चयन, जमीनी सर्वे, मतदाता विश्लेषण, प्रचार की रणनीति और संदेश तैयार करने जैसे काम करती है। चुनाव के स्तर और राज्य के हिसाब से इसके लिए भारी शुल्क लिया जाता है। बड़े राज्यों में चुनावी अभियान संभालने से कंपनी की आमदनी लगातार बढ़ती रही है।
कितनी आंकी जाती है कंपनी की संपत्ति
आईपैक एक निजी कंसल्टेंसी फर्म है, इसलिए इसकी सटीक संपत्ति सार्वजनिक नहीं होती। हालांकि मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक कई बड़े चुनावी प्रोजेक्ट संभालने के चलते इसकी कुल वैल्यू करोड़ों रुपये में मानी जाती है। लगातार राज्यों में काम मिलने से कंपनी की आर्थिक स्थिति मजबूत बताई जाती है।
रेड के बाद बढ़ी दिलचस्पी
ईडी की छापेमारी के बाद आईपैक एक बार फिर सुर्खियों में है। राजनीतिक रणनीति बनाने वाली इस कंपनी की कमाई, असर और भूमिका पर अब सबकी नजर है। चुनावी साल में हुई यह कार्रवाई आगे क्या मोड़ लेगी, यह आने वाला वक्त बताएगा।