Election Commission: मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर उठे विवाद के बीच चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में अपना हलफनामा दायर करते हुए स्पष्ट किया है कि इस प्रक्रिया को लेकर जो आरोप लगाए जा रहे हैं, वे वास्तविकता से काफी बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए हैं। आयोग ने कहा कि पश्चिम बंगाल में मताधिकार छिनने के आरोप जानबूझकर राजनीतिक उद्देश्य से उछाले जा रहे हैं, जबकि SIR एक नियमित और संवैधानिक प्रक्रिया है। सांसद डोला सेन द्वारा SIR के आदेशों को चुनौती देने के बाद आयोग ने यह विस्तृत जवाब दिया है, जिसमें उसने कहा कि मतदाता सूची की सटीकता बनाए रखने के लिए ऐसा पुनरीक्षण आवश्यक है और इसे पिछले कई दशकों से लागू किया जा रहा है।
आयोग का कानूनी आधार और मजबूत दलील
हलफनामे में चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि SIR प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 324 तथा जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की विभिन्न धाराओं से प्राप्त अधिकार के तहत की जाती है। आयोग के अनुसार सुप्रीम कोर्ट भी टीएन शेषन बनाम भारत सरकार (1995) के फैसले में मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करने के लिए आयोग के विशेष अधिकारों को मान्यता दे चुका है। इसलिए SIR कोई अपवाद नहीं, बल्कि विधिसम्मत और समय-समय पर लागू की जाने वाली व्यवस्था है। आयोग ने कहा कि विपक्ष की ओर लगाए गए आरोप भ्रम फैलाने पर आधारित हैं और मतदाता सूची के वैज्ञानिक व पारदर्शी अद्यतन को गलत तरीके से विवादित किया जा रहा है।
बढ़ते शहरीकरण के कारण संशोधन अनिवार्य
चुनाव आयोग ने यह भी बताया कि 1950 के दशक से देश में कई बार बड़े पैमाने पर मतदाता सूची का विशेष संशोधन किया गया है—1962-66, 1983-87, 1992, 1993, 2002 और 2004 इसके प्रमुख उदाहरण हैं। आयोग के अनुसार हाल के वर्षों में शहरीकरण की तेज रफ्तार और लोगों की लगातार बढ़ती आवाजाही के कारण मतदाता सूचियों में दोहराव और गलत प्रविष्टियां बढ़ जाती हैं। ऐसे में नाम जोड़ने व हटाने की प्रक्रिया नियमित हो चुकी है और इसकी निगरानी के लिए SIR बेहद आवश्यक है। राजनीतिक दलों की लगातार शिकायतों और राष्ट्रीय स्तर पर मिली प्रतिक्रिया को देखते हुए आयोग ने इस पुनरीक्षण को जरूरी बताया, ताकि लोकतांत्रिक अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।