Glaciers in Nepal melting rapidly: नेपाल समेत पूरे हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने ने आने वाले वर्षों को लेकर चिंता बढ़ा दी है। उपलब्ध वैज्ञानिक आकलनों के मुताबिक, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी बेसिन में 2050 तक ग्लेशियरों के क्षेत्रफल में करीब 35 से 45 फीसदी तक कमी आ सकती है। नेपाल में पिछले कुछ दशकों के दौरान बर्फ के भंडार में भी बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। इसका असर केवल हिमालय तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उन भारतीय राज्यों पर भी पड़ सकता है जो गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों पर निर्भर हैं। शुरुआती दौर में ज्यादा पानी और बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है, जबकि लंबे समय में पानी की कमी चुनौती बन सकती है।
बढ़ते तापमान से तेजी से पिघल रही बर्फ
हिमालयी क्षेत्र में तापमान बढ़ने की रफ्तार वैश्विक औसत की तुलना में अधिक बताई जाती है। बढ़ती गर्मी के कारण ग्लेशियर लगातार पीछे हट रहे हैं। इसके साथ पहाड़ों में जमी जमीन यानी पर्माफ्रॉस्ट के कमजोर होने से चट्टानों और बर्फीले क्षेत्रों की स्थिरता प्रभावित हो सकती है। इससे भूस्खलन, बर्फ खिसकने और अचानक बाढ़ जैसी घटनाओं का खतरा बढ़ने की आशंका है। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश जैसे हिमालयी राज्यों पर इसका असर ज्यादा पड़ सकता है।
गंगा-ब्रह्मपुत्र बेसिन में बड़ी कमी का अनुमान
वैज्ञानिक आकलनों के अनुसार, 2050 तक गंगा और ब्रह्मपुत्र बेसिन में ग्लेशियरों के क्षेत्रफल में करीब 35 से 45 फीसदी तक कमी आ सकती है। इसका प्रभाव उत्तराखंड से लेकर उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल तक दिखाई दे सकता है। इन राज्यों में खेती, पेयजल और नदियों के प्रवाह पर लंबे समय में असर पड़ने की संभावना है। ब्रह्मपुत्र नदी पर निर्भर अरुणाचल प्रदेश और असम भी ग्लेशियरों में होने वाले बदलाव के कारण संवेदनशील रह सकते हैं।
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पहले बढ़ेगा बाढ़ का खतरा
ग्लेशियर तेजी से पिघलने पर शुरुआती वर्षों में नदियों में पानी की मात्रा बढ़ सकती है। साथ ही ग्लेशियरों के पास बनने वाली झीलों का आकार बढ़ने से ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF का खतरा भी बढ़ सकता है। ऐसी झीलों के प्राकृतिक बांध टूटने पर अचानक बड़ी मात्रा में पानी नीचे की ओर आ सकता है। इससे पहाड़ी इलाकों में सड़क, पुल और बस्तियों को नुकसान पहुंच सकता है। इसका असर नदियों के साथ नीचे स्थित मैदानी क्षेत्रों तक भी पहुंच सकता है।
लंबे समय में पानी की कमी बनेगी बड़ी चुनौती
ग्लेशियरों के लगातार छोटे होने से भविष्य में स्थिति उलट सकती है। शुरुआत में ज्यादा बर्फ पिघलने से नदियों में पानी बढ़ सकता है, लेकिन जब ग्लेशियरों का आकार काफी कम हो जाएगा तो गर्मियों में उनसे मिलने वाला पानी घट सकता है। इसका सीधा असर खेती, पीने के पानी और जलविद्युत परियोजनाओं पर पड़ सकता है। गंगा-ब्रह्मपुत्र बेसिन में रहने वाली बड़ी आबादी के लिए यह गंभीर चुनौती बन सकती है। इसलिए हिमालयी ग्लेशियरों का संरक्षण और बाढ़ के साथ-साथ भविष्य के जल संकट की तैयारी भारत के लिए बेहद जरूरी हो गई है।