भारतीय रुपये में लगातार गिरावट ने सरकार की चिंता बढ़ा दी है। डॉलर के मुकाबले रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर 96.5 तक पहुंच गया है। इस गिरावट का असर सिर्फ मुद्रा बाजार तक सीमित नहीं है बल्कि व्यापार घाटा और अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई देने लगा है। अप्रैल में देश का व्यापार घाटा बढ़कर 28.4 अरब डॉलर पहुंच गया, जिसने सरकार की चिंता और बढ़ा दी है।
सरकार क्यों हुई एक्शन मोड में
सरकार अब देश के बढ़ते आयात बिल को कम करने की तैयारी में है। ऐसे विदेशी सामानों की पहचान की जा रही है जो या तो जरूरी नहीं हैं या जिनका निर्माण भारत में आसानी से किया जा सकता है। सरकार मानती है कि गैर जरूरी आयात की वजह से डॉलर की मांग बढ़ रही है और इससे रुपये पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है।
बड़े फैसले की तैयारी शुरू
अगले हफ्ते एक अहम अंतर मंत्रालयी बैठक होने वाली है। इसमें वित्त, वाणिज्य और अन्य मंत्रालयों के अधिकारी शामिल होंगे। बैठक में उन विकल्पों पर चर्चा होगी जिनसे आयात खर्च कम किया जा सके। माना जा रहा है कि कुछ विदेशी उत्पादों पर शुल्क बढ़ाया जा सकता है या उनके आयात पर सीमाएं लगाई जा सकती हैं।
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लोकल उद्योग को मिलेगा फायदा
सरकार की सोच साफ है कि जो चीज भारत में बन सकती है उसे विदेश से क्यों मंगाया जाए। इसी रणनीति के तहत घरेलू निर्माण को बढ़ावा देने पर जोर दिया जा रहा है। हाल ही में वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल भी आयातकों को सलाह दे चुके हैं कि देश में उपलब्ध उत्पादों को प्राथमिकता दी जाए।
घटिया विदेशी सामान पर नजर
सरकार सस्ते और कम गुणवत्ता वाले विदेशी उत्पादों पर भी नजर रख रही है। सभी मंत्रालयों से ऐसे उत्पादों की सूची मांगी गई है जिन पर कार्रवाई की जा सकती है। हाल ही में सोने के बढ़ते आयात को नियंत्रित करने के लिए भी सरकार ने कस्टम ड्यूटी बढ़ाने का फैसला किया था।
धीरे-धीरे लागू होगा प्लान
हालांकि सरकार जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठाना चाहती। अधिकारियों का कहना है कि किसी भी नए नियम को लागू करने से पहले यह सुनिश्चित किया जाएगा कि जरूरी वस्तुओं या घरेलू उद्योग की सप्लाई चेन पर असर न पड़े। सरकार का लक्ष्य सिर्फ आयात कम करना नहीं बल्कि रोजगार बढ़ाना, उद्योग मजबूत करना और रुपये को स्थिर करना भी है।