Bihar elections: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजे सामने आते ही राजनीतिक माहौल गर्म हो गया है। शुरुआती रुझानों में एनडीए ने मजबूत बढ़त बना ली है, जबकि महागठबंधन पीछे होता जा रहा है। चुनाव से पहले विपक्ष के चेहरे और सीएम पद के दावेदार तेजस्वी यादव ने रोजगार, महिलाओं को आर्थिक मदद और युवाओं के लिए नई योजनाओं जैसे कई बड़े वादे किए थे, लेकिन नतीजों का रुझान बिल्कुल उलट दिखाई दे रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि तेजस्वी यादव की चुनावी रणनीति आखिर कहां चूक गई, और किन कारणों ने महागठबंधन की स्थिति कमजोर कर दी।
तेजस्वी यादव की रणनीति कैसे फेल हुई?
तेजस्वी यादव की हार के प्रमुख कारणों पर नजर डालें तो कई बड़ी रणनीतिक गलतियां सामने आती हैं। सबसे पहले, कांग्रेस के साथ गठबंधन महागठबंधन की कमजोर कड़ी साबित हुआ। सीटों के बंटवारे में तेजस्वी को कई बार समझौता करना पड़ा, जिससे चुनावी गति प्रभावित हुई। दूसरा बड़ा कारण था राहुल गांधी के फैसलों पर निर्भरता, जिसके चलते तेजस्वी अपना स्वतंत्र राजनीतिक प्रभाव नहीं दिखा पाए। मुकेश सहनी के दबाव में डिप्टी सीएम पद तक देने की सहमति भी महागठबंधन की कमजोरी के रूप में देखी जा रही है। इसके अलावा, चुनाव के दौरान 'वोट चोरी' जैसे मुद्दों पर ज्यादा फोकस करने से वे मूल मुद्दों—रोजगार, शिक्षा, विकास—से भटक गए। सबसे अहम बात, महिलाओं की रिकॉर्डतोड़ वोटिंग ने चुनावी समीकरण पलट दिए, और यह वोटिंग पैटर्न महागठबंधन के खिलाफ गया।
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मतदान प्रतिशत और चुनावी माहौल
बिहार में मतदान दो चरणों में 6 और 11 नवंबर को हुआ। इस बार कुल मतदान प्रतिशत 67.13% तक पहुंचा, जो 1951 के बाद का सबसे अधिक मतदान है। यह साफ दिखा कि जनता ने बढ़-चढ़कर मतदान किया और अपने मन की सरकार चुनने की कोशिश की। अब जब मतगणना अंतिम चरण में है, सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि बिहार की सत्ता किसके हाथों में जाएगी। रुझान भले ही एनडीए के पक्ष में हों, लेकिन अंतिम नतीजे ही तस्वीर साफ करेंगे। इतना तय है कि इस चुनाव ने तेजस्वी यादव की रणनीति और महागठबंधन की एकजुटता दोनों पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।